
क्या आप सोच सकते हैं कि सैकड़ों साल पहले लोग मरने के बाद अपनों के शवों के साथ क्या करते थे? दक्षिण-पूर्व एशिया के देश लाओस में वैज्ञानिकों को एक ऐसा सच पता चला है, जिसने सबके होश उड़ा दिए हैं. शोधकर्ताओं को यहां खुदाई में पत्थर का एक महाविशाल मटकी मिली है, जिसे ‘डेथ जार यानी मौत की मटकी’ कहा जा रहा है. इस एक अकेले मटकी के अंदर से कम से कम 37 इंसानी कंकाल और कई प्राचीन चीजें मिली हैं, जिन्हें ठसाठस भरा गया था.
इस खोज से यह साफ हो गया है कि इस इलाके में बिखरे पड़े ये विशाल पत्थर के बर्तन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं थे, बल्कि कई पीढ़ियों से लाशों को ठिकाने लगाने के अजीबोगरीब तौर-तरीकों का मुख्य हिस्सा थे. यह चौंकाने वाली खुदाई उत्तरी लाओस के जियांग खौआंग पठार पर स्थित ‘साइट 75’ पर की गई है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस विशालकाय बर्तन का उपयोग एक ‘ऑस्यूरी’ यानी सामूहिक रूप से हड्डियों को रखने के लिए किया जाता था.

जार के भीतर से मिली इंसानी हड्डियां किसी एक हादसे या युद्ध में मरे लोगों की नहीं हैं, क्योंकि वे अंदर बिना किसी लाइन या तरीके के एक के ऊपर एक ठसाठस भरी हुई थीं. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि उस दौर में शव को पहले किसी दूसरी जगह सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था. जब मांस पूरी तरह खत्म हो जाता था, तब परिवार के लोग उसकी हड्डियों को बटोरकर इस सामूहिक मटके में डाल देते थे.


जांच से पता चला है कि यह ‘डेथ जार’ सन् 890 से लेकर सन् 1160 के बीच यानी करीब 270 से ज्यादा सालों तक लगातार इस्तेमाल किया जाता रहा. मटके की गहराई से केवल इंसानी हड्डियां ही नहीं, बल्कि उस दौर के इंसानों के रहन-सहन और उनकी अजीब मान्यताओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण सबूत भी बाहर आए हैं. कंकालों के साथ-साथ लोहे के औजार, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े और तांबे से बनी एक प्राचीन घंटी भी मिली है.
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि कुछ कंकालों के दांत जानबूझकर तोड़े या निकाले गए थे, जो इस बात का प्रमाण है कि उस समय मौत से जुड़ा कोई खास रिवाज निभाया जाता था. पुरातत्वविदों का कहना है कि यह एक बेहद सुव्यवस्थित समाज था, जहां लोग अपने मरे हुए पूर्वजों के पास बार-बार जाते थे, उनकी हड्डियों को दोबारा साफ करते थे और कई पीढ़ियों तक उनकी याद में ये सब करते थे.
इंसानी अवशेषों के अलावा, इस जार के भीतर से मिले बेहद दुर्लभ और रंग-बिरंगे कांच के मनकों ने इतिहासकारों को एक नया सुराग दिया है. जांच से पता चला है कि ये मनके लाओस के नहीं हैं, बल्कि इन्हें दक्षिण एशिया और मिडिल ईस्ट के देशों से मंगवाया गया था. इसका सीधा मतलब यह है कि आज से 1,200 साल पहले भी यह सुदूर जंगली इलाका चीन और दुनिया भर के व्यापारिक रास्तों से गहराई से जुड़ा हुआ था.
उस दौर के बड़े साम्राज्यों ने महाद्वीप के आर-पार ऐसे रास्ते बना दिए थे, जिनकी वजह से मिडिल ईस्ट की चीजें लाओस के इस सुदूर पठार पर बने मौत के मटकों तक पहुंच रही थीं. यह पूरी खोज लाओस के उसी मशहूर और रहस्यमयी ‘प्लेन ऑफ जार्स’ का हिस्सा है, जिसे सबसे पहले 1930 के दशक में एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने दुनिया के सामने लाया था.
इस पूरे पठार पर अलग-अलग 120 से ज्यादा जगहें हैं, जहां सैकड़ों की संख्या में ऐसे भारी-भरकम पत्थर के बर्तन बिखरे पड़े हैं, जो पिछले 90 सालों से विज्ञान के लिए एक अबूझ पहेली बने हुए हैं. ‘साइट 75’ पर मिली इस ताजा कामयाबी ने मौत से जुड़े रिवाजों पर से पर्दा तो उठाया है, लेकिन शोधकर्ता कहते हैं कि अलग-अलग जगहों पर इन बर्तनों का इस्तेमाल अलग वजहों से भी हो सकता था.
