


मार्केट में ब्रांडेड कपड़े ऊंचे दामों में बेचे जाते हैं. लेकिन कई बार इनके प्रॉडक्शन के दौरान छोटे-मोटे डिफेक्ट्स हो जाते हैं, जिसकी वजह से इन्हें बाजार में नहीं भेजा जाता. ऐसे डिफेक्टेड कपड़ों का एक कब्रिस्तान है. जी हां, चिली के अटाकामा रेगिस्तान में ब्रांडेड कपड़े डंप किए जाते हैं. इन्हें कोई उठाने तक नहीं आता.
चिली के अटाकामा को दुनिया के सबसे सूखे रेगिस्तान में एक माना जाता है. यहां जीवन पॉसिबल नहीं है. कोई भी यहां नहीं रहता. अगर कुछ लोग रहते भी हैं तो उनकी लाइफ बड़ी मुश्किल है. लेकिन इस रेगिस्तान में पहाड़ों जैसी ऊंचाई तक ब्रांडेड कपड़ों के ढेर लगे हुए हैं. ये कपड़े कभी किसी ने पहने तक नहीं हैं. फिर क्यों यहां इतने कपड़े पड़े हैं?

दरअसल, हर साल इकीके बंदरगाह से 59,000 टन नए कपड़े यहां पहुंचते हैं. इनमें से 85 प्रतिशत कपड़े कभी बाजार में बिकते तक नहीं और सीधे रेगिस्तान में फेंक दिए जाते हैं. हर साल 39,000 टन कपड़े रेगिस्तान में डंप किये जाते हैं. ये ढेर इतना बड़ा है कि स्पेस से दिखाई देता है. इसे कोई कभी छूने भी नहीं आता. रेगिस्तान में गर्मी और सूखे के कारण कई बार इनमें खुदबखुद आग लग जाती है. इससे लाखों-करोड़ों रुपये के ब्रांडेड कपड़े बर्बाद हो जाते हैं.
दुनिया की विडंबना
दूसरी तरफ पूरी दुनिया में करीब 700 मिलियन (70 करोड़) लोग ऐसे हैं जिनके पास पर्याप्त कपड़े तक नहीं हैं. अफ्रीका, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई इलाकों में मां-बाप को तय करना पड़ता है कि बच्चों को खाना खिलाएं या जूते पहनाएं. यह समस्या फास्ट फैशन इंडस्ट्री की वजह से बढ़ी है. ब्रांड हर सीजन नई डिजाइन लाते हैं और पुरानी स्टॉक सस्ते में या बिना बिके डंप कर देते हैं. चिली इस डंपिंग का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है क्योंकि यहां सस्ते में लैंड उपलब्ध है.
पर्यावरण को कितना नुकसान?
ये कपड़े रेगिस्तान की मिट्टी को प्रदूषित कर रहे हैं. सिंथेटिक कपड़ों से निकलने वाले केमिकल पानी और मिट्टी दोनों को खराब कर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के दौर में इतनी बड़ी बर्बादी पर्यावरण के लिए घातक है. विशेषज्ञ कहते हैं कि समस्या प्रोडक्शन में नहीं बल्कि डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में है. दुनिया भर में जहां जरूरत है वहां कपड़े पहुंचाने के लिए बेहतर सप्लाई चेन, ट्रांसपेरेंट ट्रैकिंग और रिसाइक्लिंग सिस्टम बनाना होगा.
कुछ संगठन “Peace Through Trade” जैसे मॉडल पर काम कर रहे हैं जो सरप्लस कपड़ों को जरूरतमंदों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. जब ये तस्वीरें वायरल हुईं तो लोग हैरान रह गए. कई यूजर्स ने लिखा, “एक तरफ पहाड़ भर कपड़े सड़ रहे हैं, दूसरी तरफ लोग नंगे घूम रहे हैं.” फास्ट फैशन ब्रांड्स पर सवाल उठ रहे हैं. ये भारत के लिए भी सबक है.
भारत भी फास्ट फैशन मार्केट में तेजी से बढ़ रहा है. हमें भी इस बर्बादी से बचना होगा. रिसाइक्लिंग, सेकंड हैंड मार्केट को बढ़ावा और जिम्मेदार खपत पर ध्यान देना जरूरी है. अटाकामा का यह कपड़ों का कब्रिस्तान इंसानी बर्बादी और लालच का जीवंत प्रमाण है. हमें उत्पादन और खपत के तरीके बदलने होंगे. नहीं तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ कचरे के ढेर विरासत में पाएंगी.
