साल 2019 में आस्ट्रिया की डेन्यूब नदी से बजरी निकालने का काम चल रहा था. इसी दौरान मजदूरों को पानी के अंदर से एक विशाल और अजीबोगरीब खजाना मिला. पानी के नीचे से लोहे की सैकड़ों नुकीली छड़ें बाहर निकाली गईं. यह कोई मामूली लोहा नहीं था. रिसर्च में साबित हुआ है कि यह खजाना करीब 2200 साल पुराना है.

इसे यूरोप में आयरन एज के लोहे की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है. यह खजाना इतना ज्यादा था कि इससे एक पूरी सेना के लिए हथियार बनाए जा सकते थे. इस दुर्लभ खोज ने प्राचीन यूरोप के व्यापार और हथियारों के निर्माण की कहानी को दुनिया के सामने ला दिया है. यूनिवर्सिटी ऑफ इन्सब्रुक के आर्कियोलॉजिस्ट पीटर ट्रेबशे ने इस खजाने की जांच की है. उनके साथ फ्रांस की रिसर्चर मैरियन बेरांगर ने भी इस प्रोजेक्ट पर काम किया है.


यह स्टडी ‘एंटीक्विटी’ जर्नल में पब्लिश हुई है. इस रिसर्च में बताया गया है कि नदी से कुल 500 से ज्यादा लोहे की छड़ें मिली हैं. इनमें 193 छड़ें पूरी तरह सुरक्षित हैं. वहीं 307 छड़ें टुकड़ों में मिली हैं. हर छड़ की लंबाई करीब 28.5 सेंटीमीटर है. इनका औसत वजन 2 किलोग्राम है. इस पूरे खजाने का कुल वजन एक मीट्रिक टन से भी ज्यादा है.

क्या इस लोहे से किसी सेना के लिए घातक हथियार बनने थे? ये छड़ें अपने आप में कोई फाइनल प्रोडक्ट नहीं थीं. इन्हें खास तौर पर दोनों सिरों से नुकीला बनाया गया था ताकि इन्हें आसानी से ट्रांसपोर्ट किया जा सके. पीटर ट्रेबशे ने कहा, ‘नदी से मिला यह लोहा इतना ज्यादा है कि इससे 500 तलवारें बनाई जा सकती थीं’. इसके अलावा इस एक टन लोहे से करीब 8000 कीलें भी बन सकती थीं.

प्राचीन काल के लोहार इन छड़ों को गर्म करके घातक हथियार और दूसरे औजार बनाते थे. यह खजाना बताता है कि उस दौर में डेन्यूब नदी के इलाके में लोहे का कितना बड़ा व्यापार होता था. हजारों साल पहले यह भारी भरकम खजाना नदी में कैसे डूब गया? यह एक बहुत बड़ा सवाल है कि इतना सारा लोहा नदी में कैसे पहुंचा.

रिसर्चर्स का मानना है कि इसे नाव के जरिए ट्रांसपोर्ट किया जा रहा होगा. ट्रेन के आविष्कार से पहले भारी सामान को नदियों के रास्ते ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता था. ऐसा लगता है कि यह खजाना किसी नाव हादसे का शिकार हो गया. नदी में नाव डूबने के साथ ही यह लोहा भी पानी में दफन हो गया. कुछ लोग नदी में लोहा डालने को किसी प्राचीन अनुष्ठान का हिस्सा मान सकते हैं. रिसर्चर्स ने इस थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया है.

बजरी निकालने का वह प्लांट जहां यह खजाना मिला. (Image Credit : Heinz Gruber/Bundesdenkmalamt)

आर्कियोलॉजिस्ट इस दुर्लभ खजाने को एक चमत्कार क्यों मान रहे हैं?

अगर मजदूरों ने समझदारी नहीं दिखाई होती तो यह खजाना हमेशा के लिए खत्म हो जाता. पीटर ट्रेबशे ने कहा, ‘यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि इतना बड़ा खजाना कबाड़ वालों के हाथ नहीं लगा’. मजदूरों ने तुरंत आस्ट्रिया की स्मारक अथॉरिटी को इसकी जानकारी दे दी.

अब आर्कियोलॉजिस्ट इस बात की जांच कर रहे हैं कि यह लोहा असल में कहां से लाया गया था. शुरुआती जांच में इसके जर्मनी के किसी इलाके से जुड़े होने के संकेत मिले हैं. आने वाले समय में केमिकल एनालिसिस से इस खजाने के असली मालिक और इसकी पूरी यात्रा का पता भी चल सकता है.

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