



कहते हैं कि अगर इंसान किसी चीज को ठान ले, तो मुश्किल से मुश्किल रास्ता भी उसे मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकता. ब्रिटेन के कार्ल बुशबी ने अपनी जिंदगी में इस बात को सच कर दिखाया है. करीब 28 साल पहले उन्होंने एक ऐसा सपना देखा था, जिसे पूरा करना किसी चुनौती से कम नहीं था. उन्होंने पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर पैदल अपने घर लौटने का फैसला किया.
साल 1998 में चिली से शुरू हुई उनकी यह यात्रा आखिरकार नवंबर 2026 में खत्म हुई. जब 57 साल की उम्र में कार्ल अपनी मां के सामने पहुंचे, तो दोनों की आंखों से आंसू छलक पड़े. मां-बेटे का यह भावुक मिलन अब लोगों का दिल छू रहा है.

50 हजार किमी का सफर, 30 देशों और 4 महाद्वीपों को पार किया
कार्ल बुशबी ने 1 नवंबर 1998 को दक्षिण अमेरिका के चिली स्थित पुंटा एरेनास से अपनी ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत की थी. उन्होंने अपने इस मिशन को ‘गोलियथ एक्सपीडिशन’ नाम दिया. उनका इरादा था कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से गुजरते हुए बिना किसी वाहन की मदद लिए पैदल इंग्लैंड के हल शहर में अपने घर पहुंचेंगे.
शुरुआत में कार्ल को उम्मीद थी कि वह करीब 12 साल में यह सफर पूरा कर लेंगे, लेकिन रास्ते की चुनौतियों ने उनकी यात्रा को लगभग तीन दशक लंबा बना दिया. इस दौरान उन्होंने करीब 50 हजार किलोमीटर की दूरी तय की और चार महाद्वीपों के 30 देशों से होकर गुजरे.
कभी रेगिस्तान की तपती जमीन पर चलना पड़ा, तो कभी घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और बर्फीले इलाकों का सामना करना पड़ा. इस पूरे सफर के दौरान उन्होंने दो नियमों का सख्ती से पालन किया. पहला, यात्रा के लिए किसी भी तरह के वाहन का इस्तेमाल नहीं करेंगे और दूसरा, जब तक पैदल चलते हुए अपने घर नहीं पहुंचेंगे, तब तक सफर खत्म नहीं करेंगे.
कभी भालू से सामना तो कभी बर्फीले पानी में फंसी जान
कार्ल का यह सफर रोमांच से भरा जरूर था, लेकिन इसमें खतरे भी कम नहीं थे. कई मौकों पर उन्हें ऐसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, जहां जिंदगी और मौत के बीच बेहद कम फासला रह गया था. दक्षिण और मध्य अमेरिका के बीच स्थित डेरियन गैप के घने और खतरनाक जंगलों को पार करना उनके लिए बड़ी परीक्षा साबित हुआ. पेरू में उन्हें भीड़ के हमले का सामना भी करना पड़ा.
एक बार तो उनका सामना ध्रुवीय भालू से भी हो गया था. साल 2006 में उन्होंने अमेरिकी एडवेंचरर दिमित्री कीफर के साथ बेरिंग स्ट्रेट पार करने की कोशिश की. इस दौरान बर्फीले समुद्र में फंसने और ठंडे पानी में गिरने के कारण उनकी जान खतरे में पड़ गई. आखिरकार हेलिकॉप्टर की मदद से उन्हें बचाया गया. इसके अलावा कैस्पियन सागर पार करना भी उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था. कार्ल ने करीब 31 दिनों तक तैरने और पानी पर तैरते रहने की तकनीक का सहारा लेकर इसे पार किया. उन्होंने इस अनोखे तरीके को ‘फ्लोटिमिंग’ नाम दिया था.
वीजा से लेकर कोरोना महामारी तक कई बार थम गया सफर
कार्ल ने जब अपनी यात्रा शुरू की थी, तब उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि मंजिल तक पहुंचने में इतने साल लग जाएंगे. कई बार उनकी हिम्मत से ज्यादा रास्ते की परिस्थितियों ने उनका इम्तिहान लिया. रूस में वीजा से जुड़ी परेशानियों के कारण उनका सफर करीब एक दशक तक प्रभावित रहा. साल 2012 में जब उन्हें रूस का वीजा नहीं मिला, तो उन्होंने हार मानने के बजाय एक अलग रास्ता चुना.
वह लॉस एंजिलिस से पैदल चलते हुए वॉशिंगटन डीसी स्थित रूसी दूतावास पहुंच गए. काफी कोशिशों के बाद उन्हें जरूरी दस्तावेज मिले और यात्रा आगे बढ़ सकी. इसके बाद कोरोना महामारी ने भी उनके कदम रोक दिए। वहीं रूस और ईरान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय हालात के चलते उन्हें अपनी यात्रा का रास्ता बदलना पड़ा. कई बार उन्हें महीनों तक इंतजार करना पड़ा, लेकिन घर पहुंचने का सपना उनके मन से कभी नहीं निकला.
28 साल बाद मां के सामने पहुंचे कार्ल
कार्ल की लंबी यात्रा का सबसे भावुक पड़ाव 2 नवंबर 2026 को आया. करीब 28 साल तक दुनिया की सड़कों पर चलने के बाद वह आखिरकार इंग्लैंड के हल शहर में अपनी मां एंजेला के घर पहुंच गए. उनके स्वागत के लिए परिवार के सदस्य, दोस्त, पत्रकार और शहर के कई लोग मौजूद थे. घर के बाहर ‘वेलकम होम सन’ का बैनर भी लगाया गया था.
जैसे ही मां एंजेला ने अपने बेटे को सामने देखा, उनकी भावनाएं छलक पड़ीं. उन्होंने बेटे से पूछा, तुम कहां चले गए थे? इसके बाद दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया. यह वह पल था, जिसका इंतजार परिवार ने करीब तीन दशक तक किया था. इस दौरान शहर के सिटी हॉल में भी कार्ल का स्वागत किया गया. उन्होंने अपनी इस उपलब्धि का श्रेय दुनिया भर में मिले लोगों के प्यार और सहयोग को दिया. इतने लंबे समय बाद वह अपने बेटे और पोती से भी दोबारा जुड़ सके.
