



दक्षिण अफ्रीका से घिरे एक छोटे से पहाड़ी देश लेसोथो में एक ऐतिहासिक और अजीबोगरीब जगह मौजूद है, जिसे हा कोम गुफा गांव (Ha Kome Cave Village) कहा जाता है. माटेका गांव के पास स्थित इस विशाल गुफा के अंदर बने मिट्टी के इग्लू जैसे घर लगभग 200 साल पुराने हैं. पहली नजर में देखने पर ये घर हाल ही में बने हुए लगते हैं, लेकिन असलियत यह है कि 19वीं सदी की शुरुआत में अपनी जान बचाने के लिए जिन कबीलों ने इन्हें बनाया था, आज भी उन्हीं की पीढ़ियां इन घरों में रह रही हैं.
इन खूबसूरत और शांत दिखने वाले घरों के निर्माण के पीछे इंसानी मांस खाने की एक बेहद खौफनाक और दर्दनाक कहानी छिपी हुई है, जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे. 19वीं सदी की शुरुआत यानी 1820 के आसपास लेसोथो के इलाके में सोथो-त्स्वाना समुदाय के लोग रहा करते थे. इसी दौरान शक्तिशाली ज़ुलू कबीलों ने आसपास के गांवों पर हमले शुरू कर दिए और उनकी जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया.

हमलों से बचने के लिए स्थानीय लोगों को भागकर ऊंचे पहाड़ों की शरण लेनी पड़ी. इस दौर में चारों तरफ युद्ध, लूटपाट और अराजकता का माहौल बन गया, जिसे स्थानीय इतिहास में ‘दिफाकाने’ या ‘म्फेकाने’ कहा जाता है. यह लेसोथो के इतिहास का सबसे काला दौर माना जाता है. युद्ध के कारण खेती पूरी तरह बर्बाद हो गई और भयंकर सूखा पड़ गया.
इस भुखमरी और अकाल ने इंसानों को इतना लाचार बना दिया कि उन्होंने भूख मिटाने के लिए दूसरे इंसानों को ही मारकर खाना शुरू कर दिया. शुरुआत में जो काम मजबूरी और पेट भरने के लिए शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे कुछ लोगों का शौक और आदत बन गया. उस दौर में नरभक्षियों ने बाकायदा अपने शिकारी गिरोह बना लिए थे जो रोज शिकार की तलाश में निकलते थे और अकेले यात्रियों या कमजोर लोगों को उठाकर ले जाते थे.
साल 1860 के दशक में लेसोथो पहुंचे एक ईसाई मिशनरी डीएफ एलेनबर्गर के अनुमान के मुताबिक, साल 1822 से 1828 के बीच लेसोथो में करीब 4,000 सक्रिय नरभक्षी मौजूद थे. यह माना जाता है कि हर नरभक्षी महीने में औसतन एक इंसान को खा जाता था. अगर इस आंकड़े का हिसाब लगाया जाए, तो महज छह सालों के भीतर लगभग 2,88,000 लोग नरभक्षियों का शिकार बन गए थे.
इसी खौफ और कत्लेआम से भागकर कुछ कबीलों ने हा कोम की विशाल लटकती चट्टानों के नीचे अपनी झोपड़ियां बनाईं और खुद को किसी तरह सुरक्षित रखा. नरभक्षिता के इस दौर से लेसोथो के महान राजा मोशवेश्वे (King Moshoeshoe) का परिवार भी नहीं बच पाया था. जब राजा मोशवेश्वे अपने लाव-लश्कर के साथ नरभक्षियों से प्रभावित इलाके से गुजर रहे थे, तब उनके दादा को नरभक्षियों के एक गिरोह ने अगवा कर लिया और उन्हें मारकर खा गए.

अपने दादा की इस मौत की खबर सुनकर कोई भी राजा गुस्से में पूरे कबीले का सफाया कर देता, लेकिन राजा मोशवेश्वे एक बेहद दूरदर्शी, बुद्धिमान और दयालु शासक थे. उन्होंने खून का बदला खून से लेने के बजाय इस कड़वाहट को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला किया. उन्होंने अपने सैनिकों को सख्त निर्देश दिए कि वे नरभक्षियों को पकड़ें जरूर, लेकिन उन्हें कोई नुकसान न पहुंचाएं.
पकड़े गए नरभक्षियों के सामने राजा ने जो किया, उसने इतिहास रच दिया. राजा मोशवेश्वे ने उन सभी नरभक्षियों के लिए एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया. पेट भरकर खाना खिलाने के बाद राजा ने हर एक नरभक्षी को रहने के लिए जमीन का एक टुकड़ा और खेती के लिए गायें उपहार में दीं. राजा ने ऐतिहासिक शब्द कहते हुए उनसे कहा, “तुमने मेरे दादा को खाया है, इसलिए अब मेरे पूर्वजों की कब्र तुम्हारे भीतर ही है, तुम सब हमारे अपने लोग हो और हमारे साथ रहोगे.”
राजा की इस कूटनीति और माफ करने की नीति ने नरभक्षियों के दिलों को पूरी तरह से पिघला दिया. उन्होंने तुरंत इंसानी मांस खाना छोड़ दिया और खेती-बाड़ी करके सामान्य जीवन जीने लगे. आधुनिक इतिहासकार राजा मोशवेश्वे की इस ऐतिहासिक सुलह की तुलना दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की उस सुलह नीति से करते हैं, जब मंडेला ने रंगभेद को खत्म करने के लिए रंगभेद के जनक कहे जाने वाले प्रधानमंत्री की पत्नी से चाय पर मुलाकात की थी.
1830 के दशक के अंत तक लेसोथो से नरभक्षिता का पूरी तरह से नामोनिशान मिट गया. आज वह दौर बीत चुका है, लेकिन लेसोथो के लोकगीतों, किताबों और हा कोम गुफा के इन मिट्टी के घरों में वह इतिहास आज भी जिंदा है. आज दुनिया भर से लोग इस 200 साल पुराने गुफा गांव को देखने आते हैं, जो न केवल इंसानी क्रूरता की याद दिलाता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि नफरत का जवाब नफरत से नहीं, बल्कि प्यार और समझदारी से दिया जा सकता है.
