



आज के दौर में जहां महंगाई आसमान छू रही है और बड़े शहरों में एक छोटा सा कमरा किराए पर लेने के लिए जेब खाली हो जाती है, वहीं इस दुनिया में एक ऐसी जगह भी मौजूद है, जहां पिछले 500 सालों से किराए में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं हुई है. जब हम यूरोप के महंगे देशों की बात करते हैं, तो दिमाग में आलीशान लाइफस्टाइल और भारी-भरकम खर्चों का ख्याल आता है.
लेकिन जर्मनी के बावारिया राज्य के ऐतिहासिक शहर ऑग्सबर्ग (Augsburg) में एक ऐसी जादुई और रहस्यमयी सोसाइटी बसी है, जिसका नाम फुगेराई (The Fuggerei) है. इसे दुनिया का सबसे पहला और सबसे पुराना सोशल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स माना जाता है. 16वीं शताब्दी से लेकर आज 21वीं सदी तक, इस सोसाइटी में रहने वाले लोग साल भर का किराया महज 1 राइनीशर गुल्डेन देते हैं, जो आज के समय में महज 80 से 85 रुपये के बराबर है.

इस ऐतिहासिक दास्तान की शुरुआत 15वीं और 16वीं सदी के सबसे बड़े व्यापारी घराने फुगर परिवार से होती है. इस परिवार के प्रमुख जैकब फुगर (Jakob Fugger) इतने अमीर थे कि लोग उन्हें ‘जैकब द रिच’ कहकर बुलाते थे. आज के फाइनेंसियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि जैकब फुगर इतिहास के सबसे अमीर इंसान थे, जिनकी कुल संपत्ति आज के मूल्य के हिसाब से 512 बिलियन अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा थी, जो एलॉन मस्क से दोगुनी थी, तो जेफ बोजोस से 60 प्रतिशत ज्यादा थी.
तांबे के व्यापार से लेकर बैंकों और खदानों पर अपना एकछत्र राज कायम करने वाले जैकब ने साल 1514 में अपनी अटूट संपत्ति का एक हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए दान करने का फैसला किया. इसी सोच के साथ 1514 से 1523 के बीच फुगेराई नाम की इस चारदीवारी से घिरी अनोखी कॉलोनी का निर्माण कराया गया.
जैकब फुगर एक धार्मिक कैथोलिक इंसान थे. उन्होंने इस परिसर को उन मेहनती, ईमानदार, लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े कैथोलिक नागरिकों के लिए बनवाया था, जो अपनी किसी गलती के बिना गरीबी का शिकार हो गए थे. उन्होंने नियम बनाया कि इस जगह का किराया कभी नहीं बदलेगा और 500 सालों के लंबे अंतराल के बाद भी उनके वंशज इस नियम का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे हैं.
हालांकि, फुगर के जमाने में भी यह किराया महज एक प्रतीकात्मक शुल्क था. इसके बदले में संस्थापक की केवल एक ही शर्त थी कि यहां रहने वाला हर निवासी दिन में तीन बार जैकब फुगर और उनके परिवार के लिए प्रार्थना करेगा. आज भी फुगेराई में रहने के लिए वही 500 साल पुराने तीनों नियम लागू हैं, जिसमें इंसान का कैथोलिक होना अनिवार्य है, वह कम से कम 2 साल से ऑग्सबर्ग का निवासी हो और उस पर कोई कर्ज न हो.

फुगेराई परिसर वास्तुकला और इतिहास का एक बेजोड़ नमूना है. यह पूरी कॉलोनी एक ऊंची दीवार से घिरी हुई है, जिसके मुख्य द्वारों को रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक पूरी तरह बंद कर दिया जाता है. इस समय के बाद केवल यहां के निवासी ही अंदर आ या जा सकते हैं. इस कॉम्प्लेक्स के भीतर गलियों के दोनों तरफ दो-मंजिला मकान बने हुए हैं.
प्रत्येक मकान में 500 से 700 वर्ग फुट के दो अपार्टमेंट हैं, जिनमें अपनी रसोई, एक बैठक, एक बेडरूम और एक छोटा कमरा है. इस कॉलोनी की एक सबसे अनोखी बात यहां के दरवाजों की घंटियां हैं. पुराने जमाने में जब सड़कों पर स्ट्रीट लाइट नहीं होती थी, तो अंधेरे में अपने घर की पहचान करने के लिए हर दरवाजे की घंटी की कुंडी को एक अलग और खास आकार दिया गया था, ताकि लोग केवल छूकर ही अपने घर का सही दरवाजा पहचान सकें.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बमबारी में यह ऐतिहासिक परिसर काफी क्षतिग्रस्त हो गया था, लेकिन युद्ध के बाद फुगर परिवार की फाउंडेशन ने इसे उसी पुरानी भव्यता के साथ दोबारा खड़ा किया. इस जगह का इतिहास इतना समृद्ध है कि प्रसिद्ध संगीतकार वोल्फगैंग एमाडेउस मोजार्ट के परदादा और राजगीर फ्रांस मोजार्ट भी 1681 से 1694 के बीच इसी फुगेराई में रहे थे, जिनकी याद में यहां एक स्मारक पट्टिका भी लगी हुई है. आज भी इस सोसाइटी में करीब 150 लोग रह रहे हैं.
मजे की बात यह है कि इस ऐतिहासिक जगह को देखने आने वाले पर्यटकों की एक बार की टिकट का दाम, यहां के निवासियों के पूरे साल के किराए से चार गुना ज्यादा है. फुगेराई आज भी एक फाउंडेशन द्वारा संचालित होती है और आधुनिकता के दौर में भी अपनी प्राचीन परंपराओं और इंसानियत की मिसाल को कायम रखे हुए है.
