आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहां कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं और पक्षियों के चहचहाने की आवाजें शांत होती जा रही हैं, वहीं मध्य प्रदेश के सतना जिले से मानवता और जीव दया की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जो देशभर के लिए प्रेरणा बन गई है. मैहर रोड पर स्थित दयोदय पशु सेवा केंद्र ने बेजुबान पक्षियों के लिए एक ऐसा भव्य 57 फीट ऊंचा बर्ड अपार्टमेंट तैयार किया है, जिसे देखकर हर कोई दंग रह जाता है.

यह महज एक ढांचा नहीं बल्कि 3000 से अधिक पक्षियों का सुरक्षित किला है, जहां उन्हें कड़कड़ाती ठंड, मूसलाधार बारिश और चिलचिलाती धूप से मुक्ति मिलती है. पिछले 28 वर्षों से निस्वार्थ भाव से पशु पक्षी सेवा में जुटा यह संस्थान आज आधुनिक चिकित्सा और पक्षी संरक्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है. सतना का यह 6 मंजिला पक्षी घर वर्तमान में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.


गुजरात के कुशल कारीगरों द्वारा विशेष रूप से डिजाइन किए गए इस टावर की ऊंचाई 57 फीट है. इस विशाल संरचना में कुल 713 कंक्रीट के घोंसले बनाए गए हैं. इस पक्षी घर की सबसे बड़ी विशेषता इसका थर्मल इंसुलेशन डिजाइन है, जो भीषण गर्मी में भी अंदर के तापमान को संतुलित रखता है. एक ही घोंसले में इतनी जगह है कि चार से पांच पक्षी आराम से रह सकते हैं.

संस्थान के अध्यक्ष अभिषेक जैन ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि वर्तमान में लगभग 200 घोंसलों में पक्षियों ने अपना बसेरा बना लिया है, जिसका अर्थ है कि करीब 500 से 600 पक्षी इस बर्ड विला को अपना परमानेंट एड्रेस बना चुके हैं. यहां पक्षियों के लिए दाने-पानी के साथ-साथ नहाने के लिए बड़ी टंकियों की भी व्यवस्था की गई है. सुरक्षा के लिहाज से टावर के निचले हिस्से में टाइल्स लगाई गई हैं ताकि सांप या अन्य शिकारी जीव ऊपर न चढ़ सकें. यहां मुख्य रूप से कबूतर और तोते अपने अंडे देते हैं और सुरक्षित वंश वृद्धि कर रहे हैं.

1998 से जारी है जीव दया का संकल्प

इस काम की नींव साल 1998 में सतना के जैन समाज द्वारा रखी गई थी. मैहर रोड पर चार एकड़ जमीन खरीदकर दयोदय गौशाला की शुरुआत की गई थी. आज इस ट्रस्ट में 151 ट्रस्टी और 21 सदस्यों की कार्यसमिति है, जो अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर बेजुबानों की सेवा में लगे हैं. वर्तमान में यहां 350 से अधिक ऐसी गायें हैं, जो या तो बूढ़ी हो चुकी हैं या गंभीर रूप से बीमार हैं.

अक्सर दूध न देने वाली या बीमार गायों को पशुपालक सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं लेकिन दयोदय संस्थान ऐसी गायों को अपनाकर उन्हें अच्छे स्तर की व्यवस्थाएं उपलब्ध कराता है. यहां की सबसे खास बात यह है कि गायों को केवल पूर्णतः जैविक चारा ही खिलाया जाता है. गौशाला से निकलने वाले गोबर से खाद बनाई जाती है, जिसका उपयोग हरे चारे को उगाने में किया जाता है, जिससे सेवा का एक साइकिल बना रहता है.

सरकारी अस्पताल जैसी सुविधाएं

जीव सेवा केवल रहने खाने तक सीमित नहीं है, संस्थान ने पशुओं के उपचार के लिए एक उच्च-स्तरीय पशु चिकित्सालय भी बनाया है. यह अस्पताल किसी भी आधुनिक सरकारी वेटरनरी हॉस्पिटल को टक्कर देता है. यहां एक अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर है, जिसमें हाइड्रोलिक ऑपरेशन टेबल लगाई गई है. इस टेबल की मदद से भारी-भरकम पशुओं को सर्जरी के लिए आसानी से लिटाया और उठाया जा सकता है, जिससे डॉक्टर और पशु दोनों को सुविधा रहती है.

निशुल्क है एनिमल एंबुलेंस

चिकित्सा सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए एक सहायक डॉक्टर की नियुक्ति की गई है, जो प्रतिदिन चार घंटे सेवा देते हैं. साथ ही सरकारी वेटरनरी अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर भी रोज एक से दो घंटे यहां निःशुल्क परामर्श देते हैं. पशुओं को समय पर भोजन, पानी, इलाज और टीकाकरण सुनिश्चित किया जाता है. इसके अलावा क्षेत्र की यह एकमात्र ऐसी संस्था है, जो इतनी आधुनिक एनिमल एंबुलेंस निशुल्क संचालित करती है.

समाज की भागीदारी से चलती है सेवा

इस विशाल पक्षी घर को तैयार करने में लगभग पौने 6 लाख रुपये की लागत आई है जबकि पशु चिकित्सालय के निर्माण में करीब चार लाख रुपये खर्च हुए हैं. सबसे सुखद पहलू यह है कि इन सेवाओं के संचालन के लिए संस्थान किसी सरकारी मदद का मोहताज नहीं है. शहर के लोग और ट्रस्टी मिलकर इस रथ को खींच रहे हैं. अभिषेक जैन बताते हैं कि लोग अपने जन्मदिन शादी की सालगिरह या त्योहारों के अवसर पर यहां आकर स्वेच्छा से दान-पुण्य करते हैं.

समाज से मिलने वाले इसी फंड और सहयोग से आज यह चार एकड़ का परिसर बेजुबानों के लिए स्वर्ग बन चुका है. सतना का यह मॉडल सिखाता है कि यदि समाज ठान ले, तो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक सुंदर संतुलन बनाया जा सकता है. आज सुबह-शाम जब सैकड़ों पक्षी इस 57 फीट ऊंचे टावर पर चहचहाते हैं, तो वह मंजर मानवता की जीत का प्रतीक नजर आता है.

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