भारत की राजधानी आज नई दिल्ली है. लेकिन भारतीय इतिहास में एक ऐसा अनोखा किस्सा भी दर्ज है जिसमें एक शहर मात्र एक दिन यानी 24 घंटे के लिए देश की राजधानी बना था. रह गए ना हैरान? भारतीय इतिहास का ये फैक्ट ज्यादातर लोगों को नहीं पता. स्कूलों में भी हमें यही पढ़ाया गया कि भारत की राजधानी नई दिल्ली है. जब से भारत को आजादी मिली है, तब से नई दिल्ली ही इंडिया की कैपिटल सिटी है लेकिन सिर्फ एक दिन के लिए किसी और शहर को भी कैपिटल बनाया गया था.

इतिहास में दर्ज है नाम

यह शहर है उत्तर प्रदेश का प्रयागराज, जिसे पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था. साल 1858 में यह घटना घटी जब ब्रिटिश साम्राज्य भारत पर अपना पूरा नियंत्रण स्थापित कर रहा था. 1857 की पहली स्वतंत्रता संग्राम (जिसे ब्रिटिश ‘विद्रोह’ कहते थे) को दबाने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त करने का फैसला लिया गया.


अब भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन यानी रानी विक्टोरिया के अधीन आना था. इस शक्ति हस्तांतरण की औपचारिक घोषणा के लिए एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया. स्थान चुना गया इलाहाबाद.

1 नवंबर 1858 (कुछ स्रोतों में 4 जनवरी 1858 का भी जिक्र है) को इलाहाबाद के मिंटो पार्क (जिसे अब मदन मोहन मालवीय पार्क कहा जाता है) में लॉर्ड कैनिंग ने रानी विक्टोरिया की घोषणा पढ़ी. इस घोषणा में ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन ब्रिटिश सरकार को सौंपने की बात कही गई थी. ठीक उसी पल इलाहाबाद को भारत की राजधानी घोषित कर दिया गया था.

क्यों चुना गया इलाहाबाद?

उस समय इलाहाबाद उत्तर-पश्चिमी प्रांत (North-Western Provinces) की राजधानी था. यह शहर गंगा-यमुना के संगम पर स्थित है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था. क्रांति के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे सुरक्षित और उपयुक्त स्थान माना. समारोह के बाद अगले ही दिन राजधानी का दर्जा वापस ले लिया गया क्योंकि कलकत्ता (अब कोलकाता) पहले से ही मुख्य प्रशासनिक केंद्र था.

इस घटना का महत्व यह है कि यह ब्रिटिश भारत के इतिहास में एक संक्रमण काल का प्रतीक था. 1858 के बाद भारत पर सीधे ब्रिटिश पार्लियामेंट का शासन शुरू हुआ, जिसे ब्रिटिश राज कहा जाता है. इलाहाबाद को सिर्फ एक दिन का यह गौरव मिला, लेकिन इतिहास के पन्नों में यह हमेशा दर्ज रह गया.

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