
नार्वे में एक ऐसा शहर है, जो सर्दियों के 6 महीनों तक अंधेरे में डूबा रहता है. पहाड़ों की वजह से यहां धूप नहीं पहुंच पाती. ऐसे में वैज्ञानिकों ने जुगाड़ लगाया और पहाड़ की चोटी पर बड़े-बड़े शीशे लगाकर सूरज की रोशनी को नीचे शहर तक पहुंचा दिया.
इंसान की जिद और विज्ञान का मेल क्या कमाल कर सकता है, इसकी जीती-जागती मिसाल नॉर्वे का एक छोटा सा औद्योगिक शहर रजुक्कन (Rjukan, Norway) है. टेलीमार्क की गहरी घाटी में बसा यह शहर अपनी खूबसूरती के लिए तो मशहूर है ही, लेकिन यहां की एक भौगोलिक समस्या ने सालों तक लोगों को परेशान रखा.

विशाल और ऊंचे पहाड़ों की गहराई में बसे होने के कारण यहां साल के 6 महीने (सितंबर से मार्च तक) सूरज की एक भी किरण नहीं पहुंच पाती थी. यह पूरा शहर आधे साल तक गहरी परछाईं और अंधेरे में डूबा रहता था. लेकिन 2013 के बाद से यहां की तस्वीर बदल गई है. अब यहां के निवासी पहाड़ की चोटी पर लगे तीन विशालकाय आईनों (Solspeil) की मदद से धूप का आनंद लेते हैं. इन जादुई आईनों को पहाड़ की चोटी पर शहर से लगभग 450 मीटर ऊपर लगाया गया है.


ये तीन बड़े ‘हेलियोस्टैटिक’ शीशे सूरज की रोशनी को सीधे शहर के मुख्य चौराहे तक पहुंचा देते हैं. यह करीब 600 वर्ग मीटर के इलाके को दिन भर धूप से सराबोर रखता है. सबसे कमाल की बात यह है कि ये आईने कोई साधारण शीशे नहीं हैं, बल्कि इन्हें कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित किया जाता है. ये आईने हर 10 सेकंड में अपनी दिशा बदलते हैं, ताकि जैसे-जैसे सूरज आसमान में चले, उसकी रोशनी का रिफ्लेक्शन ठीक उसी चौक पर बना रहे.
अब रजुक्कन के लोग सर्दियों में भी चौक पर बैठकर धूप सेंक सकते हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि इस शहर को रोशन करने का सपना आज से 100 साल पहले ही देख लिया गया था. रजुक्कन के संस्थापक और उद्योगपति सैम ईडे ने यहां एक फर्टिलाइजर फैक्ट्री शुरू की थी. उन्होंने रजुक्कन को इसलिए चुना, क्योंकि यहां 104 मीटर ऊंचा झरना था, जिससे बिजली बनाना आसान था.
ईडे ने इस शहर को बसाने में नॉर्वे के कुल राष्ट्रीय बजट से भी दोगुना पैसा खर्च किया था. वे उसी समय पहाड़ पर आईने लगाना चाहते थे, लेकिन उस दौर में ऐसी तकनीक मौजूद नहीं थी. विकल्प के तौर पर उन्होंने 1928 में क्रोसोबानेन नाम की एक गोंडोला (उड़न खटोला) बनवाई, ताकि लोग पैसे देकर पहाड़ के ऊपर जा सकें और धूप का आनंद ले सकें. यह गोंडोला आज भी चालू है. इस पुराने सपने को दोबारा जिंदा किया साल 2005 में मार्टिन एंडरसन नाम के एक कलाकार ने, जो इसी शहर के निवासी थे. मार्टिन ने सुना था कि अमेरिका के एरिजोना के एक स्टेडियम में घास उगाने के लिए छोटे आईनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
उन्होंने इटली के विगानेला शहर के बारे में भी पढ़ा, जहां रजुक्कन की तरह ही पहाड़ों की परछाईं से बचने के लिए आईने लगाए गए थे. मार्टिन ने शहर प्रशासन को मनाया और करीब 5 करोड़ रुपये (5 मिलियन नॉर्वेजियन क्रोन) का निवेश जुटाया. इसमें ज्यादातर पैसा उसी कंपनी (नॉर्क हाइड्रो) ने दिया, जिसे सैम ईडे ने बनाया था.
आज रजुक्कन का यह ‘सन मिरर’ प्रोजेक्ट दुनिया भर के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है. लोग यह देखने खिंचे चले आते हैं कि कैसे इंसान ने प्रकृति की सीमाओं को पार कर अपने लिए रोशनी का इंतजाम कर लिया. जहां पहले लोग आधे साल तक डिप्रेशन और अंधेरे में रहते थे, अब वे सूरज की रोशनी में मुस्कुराते हुए नजर आते हैं. यह कहानी साबित करती है कि अगर इंसान के पास सही तकनीक और मजबूत इरादा हो, तो वह पहाड़ों को भी आईना दिखा सकता है.
