



हिंदू धर्म में काशी (वाराणसी) को मुक्ति का द्वार कहा जाता है. मान्यता है कि जो व्यक्ति काशी में अंतिम सांस लेता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर चिताएं 24 घंटे जलती रहती हैं लेकिन पारंपरिक मान्यताओं और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार कुछ खास तरह के शवों को यहां के मुख्य श्मशान घाटों पर नहीं जलाया जाता.
अगर ये पांच लाशें घाट पर आती हैं तो इन्हें लौटा दिया जाता है या अलग विधि से अंतिम संस्कार किया जाता है. सोशल मीडिया और हिंदी मीडिया में एक नाविक के वीडियो के जरिए यह बात चर्चा में आई है. उन्होंने बताया कि पांच तरह के शवों को काशी में दाह संस्कार की अनुमति नहीं मिलती. आइये आपको बताते हैं कौन है पांच लोग.

1. साधु-संत
साधु-संतों और सन्यासियों के शव को आमतौर पर नहीं जलाया जाता. उन्हें जल समाधि (गंगा में विसर्जन) या थल समाधि (जमीन में दफन) दी जाती है. मान्यता है कि साधु पहले से ही मोक्ष प्राप्त कर चुके होते हैं, इसलिए अग्नि संस्कार की जरूरत नहीं होती.
2. 12 साल से कम उम्र के बच्चे
12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के शव को मुख्य घाटों पर नहीं जलाया जाता है. उन्हें निर्दोष और भगवान का स्वरूप माना जाता है. ऐसे बच्चों को अक्सर गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है.
3. गर्भवती महिलाएं
गर्भवती महिला की मृत्यु होने पर उसके शव को भी मुख्य श्मशान में नहीं जलाया जाता. धार्मिक और व्यावहारिक कारण बताए जाते हैं. जलाने पर पेट फटने और अजन्मे बच्चे के बाहर आने की आशंका को अशुभ माना जाता है. इन्हें जल समाधि दी जाती है.
4. सांप काटने से मृत्यु
सर्पदंश से मरने वाले व्यक्ति के शव को नहीं जलाया जाता है. पुरानी मान्यता है कि ऐसे शरीर में कुछ समय तक प्राण रह सकते हैं या कोई तंत्र-मंत्र से जीवित कर सकता है. इसलिए शव को केले के तने से बांधकर गंगा में बहा दिया जाता है.
5. त्वचा रोग (कुष्ठ आदि) से पीड़ित
कुष्ठ या गंभीर त्वचा रोग से मरने वाले लोगों के शव को भी पारंपरिक रूप से नहीं जलाया जाता. माना जाता था कि जलाने से बीमारी फैल सकती है.
ये सारे नियम मुख्य रूप से पारंपरिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं. आधुनिक समय में कानूनी रूप से कोई सख्त पाबंदी नहीं है, लेकिन डोम समुदाय और घाट पर काम करने वाले लोग इन रीति-रिवाजों का पालन करते हैं. काशी में मरने से मुक्ति मिलने की मान्यता स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में मिलती है. भगवान शिव स्वयं काशी में वास करते हैं और मरने वाले को तारक मंत्र सुनाकर मोक्ष देते हैं. फिर भी कुछ मामलों में अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है.
