



भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट के कई बड़े प्रोजेक्ट समय-समय पर लॉन्च होते रहे हैं. कुछ सफल रहे तो कई अधूरे रह गए और निवेशकों के पैसे फंस गए. इनमें से एक प्रमुख नाम है पुणे के पास लवासा प्रोजेक्ट का. इसे भारत का पहला प्राइवेट हिल स्टेशन बनाने का सपना देखा गया था. इटली के तटीय शहर पोर्टोफिनो की तर्ज पर डिजाइन किया गया यह टाउन आज घोस्ट टाउन जैसा दिखता है.
हजारों करोड़ रुपये का निवेश होने के बावजूद यहां मुट्ठीभर लोग रहते हैं और बेसिक सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं है. लवासा की कहानी दो दशक पहले शुरू हुई. महाराष्ट्र सरकार की हिल स्टेशन पॉलिसी के तहत हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी यानी एचसीसी ने इसे विकसित करने का जिम्मा लिया था. अजित गुलाबचंद के नेतृत्व में यह प्रोजेक्ट पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में मुलशी तालुका के आसपास फैला.

वरसगांव बांध के बैकवाटर्स के किनारे रंग-बिरंगी इमारतें, लेकसाइड प्रॉमनेड, होटल, विला और आधुनिक सुविधाओं वाला शहर बसाने की योजना थी. पांच टाउन और सात पहाड़ियों पर फैले इस प्रोजेक्ट में दो लाख लोगों के रहने की कल्पना की गई थी. लेकिन इसका अंत ऐसा होगा, किसी ने नहीं सोचा था.
इन्वेस्टर्स को किया था आकर्षित
शुरुआत में लवासा आकर्षण का केंद्र बना. पर्यटक यहां आने लगे. कुछ लोग विला और अपार्टमेंट खरीदने लगे. इटालियन अंदाज की सड़कें, खुले स्थान और हरियाली ने इसे खास बनाया. लेकिन जल्द ही समस्याएं सामने आने लगीं. 2010 में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने निर्माण पर रोक लगा दी. आरोप था कि जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी नहीं ली गई थी. प्रोजेक्ट पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में था.
पेड़ों की कटाई, ढलानों पर निर्माण और जल स्रोतों पर प्रभाव को लेकर सवाल उठे. कानूनी लड़ाई शुरू हुई. कुछ समय बाद रोक हटी लेकिन प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ गई. जमीन अधिग्रहण को लेकर भी विवाद रहे. स्थानीय किसानों और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की बातें उठीं. सीएजी रिपोर्ट में पारदर्शिता की कमी के आरोप लगे.
बर्बाद हो गया प्रॉजेक्ट
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए. इन सबके बीच कंपनी पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया. 2018 के आसपास लवासा कॉर्पोरेशन दिवालिया प्रक्रिया में चली गई. वित्तीय लेनदारों के दावे हजारों करोड़ रुपये के थे. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी में मामला चला. कई रिवाइवल प्लान आए. 2023 में डार्विन प्लेटफॉर्म इन्फ्रास्ट्रक्चर का प्लान मंजूर हुआ लेकिन भुगतान संबंधी मुद्दों पर 2024 में उसे रद्द कर दिया गया.
इसके बाद फिर से नई बोली प्रक्रिया शुरू हुई. वेलस्पन और अन्य कंपनियों ने रुचि दिखाई लेकिन पर्यावरण मंजूरी और अन्य शर्तों के कारण मामला अभी भी उलझा हुआ है. आज लवासा की हालत देखकर लगता है जैसे कोई फिल्म सेट छोड़कर चला गया हो. अधूरी इमारतें, खाली सड़कें, बंद दुकानें और वीरान माहौल. दासवे सर्कल इलाके में कुछ होटल, कैफे और गतिविधियां चलती हैं.
कुछ लोग यहां रहते हैं. अनुमान है कि दो हजार से पांच हजार के बीच आबादी है. कई घर खरीदारों के पास चाबियां नहीं पहुंचीं. कुछ को कब्जा मिला लेकिन रखरखाव और सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ रहा है. बरसात में लैंडस्लाइड जैसी घटनाएं भी हुई हैं. पर्यटक अभी भी जिज्ञासावश यहां आते हैं. पहाड़, झील और रंगीन इमारतें सुंदर लगती हैं लेकिन जीवन का अभाव खलता है. कई लोग इसे “शहर जो सांस लेना भूल गया” कहते हैं.
