जब भी लंबा वीकेंड आता है तो यहां के लोग अक्सर पहाड़ों पर घूमने जाते हैं. देहरादून, मसूरी, कैंची धाम से लेकर हिमाचल तक यहां के लोग घूमने जाते हैं. मसूरी की भीड़ से दूर एक ऐसा ही गांव ‘सैंजी’ बसा हुआ है. इस गांव की पहचान पहाड़ की संस्कृति, मंदिर से नहीं है. यह गांव उतराखंड के टिहरी-गढ़वाल क्षेत्र के जौनपुर एरिया में आता है.

इस गांव की पहचान अनाज से है. जी हां, इस गांव के हर घर के बाहर मक्का के भुट्टे लटकते नजर आते हैं. इसलिए इसे ‘कॉर्न विलेज ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है. सबसे ज्यादा मक्का इसी गांव में होता है. गांव की दुकान, मकान सब जगह सिर्फ मक्के के भुट्टे नजर आते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि वो सुखाने के लिए भुट्टे को लटकाते हैं.


सबसे ज्यादा मक्का इस गांव में होता है. लोगों को याद भी नहीं है कि यह परंपरा कब से चली आ रही है. कई बार 6 माह तक भुट्टों को इसी तरह से लटकाकर रखते हैं. जब जरूरत होती है तो इसका आटा पीस लेते हैं. अगर मक्के को अंदर रखेंगे तो खराब हो जाएगा, इसलिए इसे मकान के बाहर, अंदर,बरामदे में, मकान के कोने-कोने में लटकाकर रखा जाता है.

गांव की महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह बनाया हुआ है. यहां पर मक्के के अलावा सब्जियां, दालें, राजमा, नौरंगी दाल, रेड राइस भी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं बेचती हैं. इनमें कोई केमिकल नहीं होता. शुद्ध अनाज यहां पर मिलता है. इसके अलावा रागी का आटा, पहाड़ी मसाला मिलता है जिसे टिमरू, मोरा, धनिया, लहसुन को सुखाकर ओखली में कूटकर तैयार किया जाता है.

स्कूल में फ्री में पढ़ाया जाता है बच्चों को

सबसे बड़ी बात यह है कि गांव में एक इंग्लिश मीडियम स्कूल भी है. स्कूल में बच्चों को फ्री में पढ़ाया जाता है. यह स्कूल पिछले करीब 16 साल से चल रहा है. कनाडाई महिला लोरी ने इस स्कूल को शुरू किय था. लोरी करीब 17-18 साल पहले अपने पति के साथ इस गांव में रहने आई थीं. उन्हें गांव की संस्कृति भा गई. स्कूल में स्मार्टबोर्ड से पढ़ाई होती है.

कई बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं. एलईडी और इंटरनेट से क्लास कनेक्टेड रहती है. फ्री में किताबें मिलती है. कोई फीस नहीं ली जाती है. बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं. इस गांव को ‘कॉर्न विलेज ऑफ इंडिया’ की पहचान भी लोरी मैम और उनके पति ने दिलाई है. लोरी मैम इस गांव में अपना कैफे और बेकरी भी चलाती हैं. इसी कैफे की कमाई का पैसा बच्चों के स्कूल में भेजा जाता है. यहां की संस्कृति हिमाचल से बहुत मिलती-जुलती है.

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