



Lake of No Return: भारत में झीलों की कमी नहीं है. कहीं झीलें अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं तो कहीं इनसे जुड़ी पुरानी कहानियां लोगों को आकर्षित करती हैं. झीलें सिर्फ घूमने-फिरने की जगह नहीं होतीं, बल्कि इनका पर्यावरण के लिए भी बहुत महत्व है. ये पानी को सहेजने, आसपास के जीव-जंतुओं को रहने की जगह देने और स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने में मदद करती हैं.
भारत की कई झीलें पर्यटन का बड़ा केंद्र भी हैं. लेकिन आज हम जिस झील की बात कर रहे हैं, वह भारत में नहीं बल्कि भारत-म्यांमार सीमा के पास म्यांमार की तरफ मौजूद है. इसका नाम है ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ (Lake of No Return), जिसे नवांग यांग झील (Naung Yang Lake) के नाम से भी जाना जाता है. यह झील पांगसाउ पास (Pangsau Pass) के पास स्थित है और भारत के अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले की तरफ से इसे देखा जा सकता है.

कहां मौजूद है ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’?
‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ म्यांमार की तरफ पांगसाउ पास के पास स्थित है. पांगसाउ पास भारत और म्यांमार की सीमा पर अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के पास है. अरुणाचल प्रदेश सरकार की वेबसाइट के मुताबिक, इस झील को पांगसाउ पास से देखा जा सकता है. यह इलाका घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ है. इसी वजह से यहां का प्राकृतिक वातावरण भी काफी आकर्षक माना जाता है. झील के आसपास रहने वाले समुदायों और इस क्षेत्र के इतिहास ने भी इसे खास बनाया है.
आखिर क्यों पड़ा ‘Lake of No Return’ नाम?
इस झील का नाम सुनते ही सबसे पहला सवाल यही आता है कि आखिर इसे ‘Lake of No Return’ यानी ‘वापस न लौटने वाली झील’ क्यों कहा जाता है? इस नाम के पीछे कई कहानियां और मान्यताएं बताई जाती हैं. इनमें से एक कहानी द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी है. सरकारी पर्यटन और चांगलांग जिला प्रशासन की जानकारी के मुताबिक, युद्ध के दौरान इस इलाके में कई विमानों के झील और उसके आसपास दुर्घटनाग्रस्त होने की बातें सामने आती हैं.
उस समय पांगसाउ पास और आसपास का इलाका बेहद कठिन रास्तों और खराब मौसम के लिए जाना जाता था. इसी वजह से झील के नाम को लेकर विमान दुर्घटनाओं वाली कहानी काफी मशहूर हुई. हालांकि, इसके नाम की पूरी कहानी को लेकर अलग-अलग दावे और लोककथाएं भी मिलती हैं.
जापानी सैनिकों से भी जुड़ी है एक कहानी
झील के नाम से जुड़ी एक और कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के समय की बताई जाती है. कहा जाता है कि कुछ जापानी सैनिक रास्ता भटककर इस इलाके तक पहुंच गए थे. इसके बाद उनके बीमार पड़ने और मौत होने की कहानी भी सुनाई जाती है. लेकिन ऐसी कई बातें ऐतिहासिक दस्तावेजों से पूरी तरह साबित नहीं हैं. इसलिए इन्हें इस झील से जुड़ी प्रचलित कहानियों और मान्यताओं के तौर पर ही देखा जाता है.
गांव और बड़ी मछली वाली लोककथा
इस झील से जुड़ी एक स्थानीय लोककथा भी काफी दिलचस्प है. कहानी के मुताबिक, एक बार एक गांव के व्यक्ति ने बड़ी मछली पकड़ी और पूरे गांव को दावत पर बुलाया. लेकिन उसने एक बुजुर्ग महिला और उसकी पोती को दावत में नहीं बुलाया. कहानी में बताया जाता है कि झील के संरक्षक इससे नाराज हो गए.
उन्होंने बुजुर्ग महिला और उसकी पोती को गांव छोड़कर चले जाने की चेतावनी दी. दोनों के वहां से निकलने के बाद अगले दिन पूरा गांव पानी में डूब गया. यह कहानी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है. हालांकि, यह एक लोककथा है और इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रमाणित नहीं माना जा सकता.
‘स्थानीय बरमूडा ट्रायंगल’ भी कहते हैं लोग
रहस्यमयी कहानियों की वजह से ‘Lake of No Return’ को कई बार स्थानीय ‘Bermuda Triangle’ जैसे नामों से भी जोड़ा जाता है. झील का नाम, द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी घटनाएं और स्थानीय लोककथाएं मिलकर इसे रहस्य पसंद करने वाले लोगों के लिए खास बना देती हैं. हालांकि, यह कहना कि झील के पास जाने वाला कोई भी व्यक्ति कभी वापस नहीं आया, एक प्रचलित रहस्यमयी दावा है, प्रमाणित तथ्य नहीं. झील से जुड़े रहस्य को समझने के लिए इतिहास और लोककथाओं को अलग-अलग देखना जरूरी है.
खूबसूरती और इतिहास दोनों बनाते हैं इसे खास
इस जगह की खासियत सिर्फ रहस्यमयी कहानियां नहीं हैं. पांगसाउ पास और आसपास का इलाका प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास से भी जुड़ा हुआ है. स्टिलवेल रोड यानी लेडो रोड भी इसी क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाता है. यही वजह है कि यह इलाका प्रकृति, इतिहास और रहस्य- तीनों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है. ‘Lake of No Return’ की कहानी भले ही कई सवाल छोड़ती हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसके साथ जुड़ी हर कहानी इस जगह को और रहस्यमयी बना देती है.
