



इटली ने एक खतरनाक घुसपैठिए से निपटने के लिए नया हथियार खोज लिया है. यह हथियार कोई मशीन नहीं बल्कि ऑक्टोपस की एक विशाल आर्मी है. इटली के समंदर में ब्लू क्रैब नाम के केकड़ों ने भारी आतंक मचा रखा है. ये क्रैब दशकों पहले गलती से इटली के पानी में आ गए थे. अब इनकी संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है. ये क्रैब मछली पकड़ने वाले जाल फाड़ रहे हैं.
इसके अलावा ये कीमती सीप और मसल्स को भी खा रहे हैं. इससे इटली की कोस्टल इकॉनमी को भारी नुकसान हो रहा है. इस तबाही को रोकने के लिए साइंटिस्ट्स ने समंदर में लाखों ऑक्टोपस छोड़ने का फैसला किया है. उम्मीद है कि ये ऑक्टोपस बड़े होकर इन केकड़ों को अपना शिकार बनाएंगे. इस बड़े कदम से इटली की फिशिंग इंडस्ट्री को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है.

ब्लू क्रैब ने इटली की इकॉनमी को दिया 200 मिलियन यूरो का झटका
ब्लू क्रैब का वजन लगभग दो पाउंड होता है. इनके नीले रंग के पंजे काफी आकर्षक लगते हैं लेकिन ये बहुत खतरनाक होते हैं. इन केकड़ों का कोई नेचुरल शिकारी नहीं है. इसलिए इनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है. कोल्डिरेटी नाम के एक संगठन ने इस नुकसान का एनालिसिस किया है. यह संगठन मछुआरों और किसानों का प्रतिनिधित्व करता है.
उनके अनुमान के मुताबिक अब तक 200 मिलियन यूरो यानी लगभग 170 मिलियन पाउंड (लगभग 22,24,18,00,000 रुपये) का नुकसान हो चुका है. ये क्रैब समंदर में मिलने वाले क्लैम और मसल्स को पूरी तरह चट कर जाते हैं.
एमिलिया-रोमाग्ना के एग्रीकल्चर और फिशरीज इंचार्ज एलेसियो ममी ने कहा, ‘ब्लू क्रैब सिर्फ एक आक्रामक प्रजाति नहीं है. यह हमारे पानी में आए अब तक के सबसे गंभीर संकटों में से एक है.’ कुछ इलाकों में इन केकड़ों ने 70 प्रतिशत क्लैम प्रोडक्शन को नष्ट कर दिया है.
ऑक्टो-ब्लू प्रोजेक्ट क्या है और इसके तहत कितने ऑक्टोपस समंदर में छोड़े गए?
- इटली के साइंटिस्ट्स ने इस समस्या का एक अनोखा हल निकाला है. उन्होंने एड्रियाटिक तट के रिकसिओन और सेसेनाटिको में 130,000 बेबी ऑक्टोपस छोड़े हैं. ये दोनों शहर ब्लू क्रैब के हमले से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.
- ये क्रैब मूल रूप से अटलांटिक के हैं. लेकिन अब इन्होने भूमध्य सागर में अपना नया घर बना लिया है. इन ऑक्टोपस को लैब में पैदा किया गया है. जब ये सिर्फ कुछ मिलीमीटर लंबे थे, तब इन्हें पानी में छोड़ दिया गया.
- बोलोग्ना यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट डॉ. ओलिविएरो मोर्डेंटी ‘ऑक्टो-ब्लू’ प्रोजेक्ट को मैनेज कर रहे हैं. डॉ. मोर्डेंटी ने कहा, ‘ये एक ऐसे शिकारी हैं जो ब्लू क्रैब को कंट्रोल करने में योगदान दे सकते हैं.’
- ऑक्टोपस को सुरक्षित रखने के लिए पानी के नीचे कृत्रिम घर भी बनाए गए हैं. बोलोग्ना यूनिवर्सिटी के एक्वाकल्चर एक्सपर्ट एंटोनियो कैसिनी ने कहा, ‘हमने ऑक्टोपस को चुना है. क्योंकि यह जंगली अवस्था में क्रस्टेशियंस का एक भयंकर शिकारी है.’
क्या ऑक्टोपस की ये आर्मी ब्लू क्रैब का सफाया करने में कामयाब होगी?
शुरुआत में 130,000 बेबी ऑक्टोपस छोड़े गए हैं. लैब में और भी ऑक्टोपस तैयार किए जा रहे हैं जिन्हें बाद में समंदर में उतारा जाएगा. बायोलॉजिस्ट्स का कहना है कि जब ये ऑक्टोपस पूरी तरह बड़े हो जाएंगे. तब वे एक दिन में चार क्रैब तक पकड़ कर खा सकेंगे.
हालांकि यह अभी तय नहीं है कि ऑक्टोपस आर्मी पूरी तरह से सफल होगी या नहीं. क्योंकि बेबी ऑक्टोपस की मृत्यु दर लगभग 99 प्रतिशत होती है. फिर भी एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है.
डॉ. मोर्डेंटी ने कहा, ‘अगर एक ऑक्टोपस एक मादा ब्लू क्रैब को खाता है, तो याद रखें कि वह क्रैब 1.5 से 2 मिलियन अंडे दे सकती थी.’ एलेसियो ममी ने बताया कि फिशिंग सेक्टर को बचाना उनके लिए तत्काल प्राथमिकता है. ब्लू क्रैब की वजह से एमिलिया-रोमाग्ना और वेनेटो में कई एक्वाकल्चर बिजनेस बंद हो गए हैं.
नदियों तक कैसे पहुंच गए ब्लू क्रैब?
- ब्लू क्रैब ने खुद को नए माहौल में बहुत अच्छी तरह ढाल लिया है. हाल ही में ये इटली की सबसे लंबी नदी पो में भी पाए गए हैं. इन्हें नदी के मुहाने से लगभग 100 मील दूर गुस्टाला नाम के शहर के पास पकड़ा गया था. यह यूरोप में मीठे पानी में उनके घुसपैठ का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है.
- फेरारा यूनिवर्सिटी की साइंटिस्ट अन्ना गविओली ने इस बात पर हैरानी जताई है. गविओली ने कहा, ‘पो नदी में क्रैब का मार्च बहुत ही असाधारण था.’ ऐसा माना जा रहा है कि भीड़भाड़ से बचने के लिए क्रैब नए क्षेत्रों की तलाश कर रहे हैं.
- गविओली ने कहा, ‘जब उनकी संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है, तो बड़े क्रैब छोटे क्रैब को खा जाते हैं.’ इटली के अधिकारी अब लोगों को ब्लू क्रैब खाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. ये क्रैब अब सुपरमार्केट में दिखाई देने लगे हैं.
रेस्टोरेंट्स भी ब्लू क्रैब से सलाद और पास्ता बना रहे हैं. लेकिन इनकी आबादी इतनी ज्यादा है कि कंज्यूमर्स अभी तक इनकी संख्या में खास कमी नहीं ला पाए हैं. माना जाता है कि ये क्रैब जहाजों के पानी के जरिए यहां पहुंचे थे.
