



आज के समय में बच्चों से लेकर बड़ों तक, ज्यादातर लोगों का काफी समय मोबाइल फोन पर बीतता है. कोई सोशल मीडिया पर वीडियो देखता है, तो कोई गेम खेलने में लगा रहता है. ऐसे में किताबें पढ़ने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है. लेकिन भारत में एक ऐसा गांव भी है, जहां लोगों को किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इसके लिए पैसे भी दिए जाते हैं.
इतना ही नहीं, यहां पर्यावरण को बचाने के लिए भी अनोखी पहल की गई है. प्लास्टिक कचरा जमा करने पर चीनी दी जाती है, जबकि पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने वालों को आर्थिक मदद देकर प्रोत्साहित किया जाता है. आइए जानते हैं, भारत के इस अनोखे गांव के बारे में. दरअसल, हम जिस गांव के बारे में बात कर रहे हैं, उसका नाम रनसिंह कलां है.

पंजाब के मोगा जिले का रनसिंह कलां गांव पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिए अपनी खास पहल के कारण चर्चा में है. यहां लोगों में किताबें पढ़ने की आदत विकसित करने की कोशिश की जा रही है. गांव की लाइब्रेरी में करीब 1,000 किताबें मौजूद हैं, जिनकी मदद से लोग अपनी जानकारी बढ़ा सकते हैं और नई चीजें सीख सकते हैं.
आजकल बहुत से बच्चे और युवा अपना खाली समय मोबाइल फोन पर बिताते हैं. ऐसे में उन्हें किताबों की ओर आकर्षित करना आसान नहीं होता. रनसिंह कलां गांव में इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए पढ़ने की आदत को बढ़ावा दिया जा रहा है. यहां लोगों को सिर्फ किताबें पढ़ने की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है.
इस पहल की खास बात यह है कि किताबें पढ़ने वालों को पैसे देकर भी प्रोत्साहित किया जाता है. इससे लोगों में पढ़ने की रुचि बढ़ाने की कोशिश की जाती है. गांव में शिक्षा को केवल स्कूल या कॉलेज तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे जीवनभर सीखते रहने का एक तरीका समझा जाता है.
परीक्षा के जरिए देखा जाता है कि किताबों से क्या सीखा
इस गांव में लोगों को किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ यह भी देखा जाता है कि उन्होंने पढ़कर कुछ सीखा है या नहीं. इसके लिए साल के अंत में लिखित और मौखिक परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं. इन परीक्षाओं के जरिए लोगों की समझ और जानकारी का आकलन किया जाता है. जो लोग अच्छा प्रदर्शन करते हैं, उन्हें सम्मानित किया जाता है. इस तरह पढ़ने वालों को अपनी मेहनत का इनाम भी मिलता है.
ऐसी पहल बच्चों और युवाओं को नई जानकारी हासिल करने के लिए प्रेरित कर सकती है. साथ ही, इससे किताबों को केवल परीक्षा पास करने का साधन मानने के बजाय ज्ञान बढ़ाने का जरिया समझने में मदद मिलती है. किताबें पढ़ने से शब्दों की जानकारी बढ़ती है, सोचने-समझने की क्षमता बेहतर होती है और दुनिया को देखने का नजरिया भी बदल सकता है. अगर बच्चों में कम उम्र से ही पढ़ने की आदत विकसित हो जाए, तो यह आगे चलकर उनके काफी काम आ सकती है.
प्लास्टिक कचरा देने पर मिलती है चीनी
रनसिंह कलां गांव की खासियत केवल पढ़ाई तक ही सीमित नहीं है. यहां पर्यावरण को साफ रखने के लिए भी एक अनोखी पहल चलाई गई थी. गांव में प्लास्टिक कचरा जमा करके देने पर उसके बदले चीनी देने की व्यवस्था शुरू की गई. इसका उद्देश्य लोगों को प्लास्टिक इधर-उधर फेंकने के बजाय उसे इकट्ठा करके जमा करने के लिए प्रेरित करना था.
प्लास्टिक कचरा आज भारत के कई गांवों और शहरों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है. प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें और दूसरे सामान सड़कों, नालियों और खाली जगहों पर पड़े दिखाई देते हैं. इससे गंदगी फैलती है और जल निकासी व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है. कई तरह के प्लास्टिक को नष्ट होने में बहुत लंबा समय लगता है, इसलिए इसका सही तरीके से निपटारा करना जरूरी है.
ऐसे में प्लास्टिक कचरे के बदले चीनी देने जैसी पहल लोगों को सफाई के प्रति जागरूक करने का एक दिलचस्प तरीका है. जब लोगों को किसी काम के बदले छोटा-सा प्रोत्साहन मिलता है, तो वो उसमें हिस्सा लेने के लिए प्रेरित हो सकते हैं. हालांकि, कचरा इकट्ठा करने के साथ उसका सही तरीके से निपटारा और रिसाइक्लिंग भी जरूरी है.
पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने वालों को भी प्रोत्साहन
गांव में पर्यावरण संरक्षण के लिए पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने वालों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की योजना भी चलाई गई. पेड़ लगाना पर्यावरण के लिए अच्छा कदम है, लेकिन केवल पौधा लगा देना ही काफी नहीं होता. उसकी रोज देखभाल करना और उसे बड़ा होने तक सुरक्षित रखना भी काफी ज्यादा जरूरी है.
अक्सर पौधे लगाने के अभियान तो चलाए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद उनकी देखभाल नहीं हो पाती. ऐसे में अगर लोगों को पौधों की देखभाल के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो उनके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बढ़ सकती है. रनसिंह कलां में इस तरह की पहल के जरिए लोगों को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझाने की कोशिश की गई है.
