
सोशल मीडिया इन दिनों पाकिस्तान के मुल्तान जिले से आई एक अनोखी शादी की खबर से गूंज रहा है. शुजाबाद इलाके में एक ही परिवार के 9 युवकों ने अपनी 9 चचेरी बहनों से एक साथ निकाह कर लिया. यह सामूहिक विवाह ना सिर्फ अपने पैमाने के लिए बल्कि दहेज मुक्त होने के कारण भी चर्चा का विषय बना हुआ है. पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया यूजर्स इसे “नेकी की मिसाल” बता रहे हैं.
घटना शुजाबाद की है, जो मुल्तान का उपनगरीय इलाका है. यहां 9 दुल्हे मुहम्मद काशिफ, मुहम्मद आसिम, मुहम्मद अमीन, मुहम्मद नईम, मुहम्मद नवेद, मुहम्मद राशिद, मुहम्मद बिलाल, मुहम्मद शहबाज और मुहम्मद अली ने अपनी चचेरी बहनों के साथ एक ही समारोह में शादी कर ली. जैसे ही ये खबर इंडियन मीडिया में आई, वायरल हो गई. जहां पाकिस्तान में इस निकाह की तारीफ हो रही है वहीं भारत में लोगों ने इसपर चिंता जताई है.

एक साथ हुआ निकाह
एक ही मंडप में 9 जोड़ियों ने निकाह पढ़ा और बाद में एक ही वलीमा का आयोजन किया गया. परिवार ने जानबूझकर भव्यता से दूर रहते हुए सरल तरीके से शादी की. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि दोनों परिवारों ने दहेज लेने-देने से साफ इनकार कर दिया. पाकिस्तान में जहां दहेज की वजह से कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं, वहां इस फैसले को सराहा जा रहा है. पाकिस्तानी यूजर्स लिख रहे हैं – “ये असली मुस्लिम परंपरा है, रिश्तेदारी मजबूत होती है और खर्च भी बचता है.” कुछ पोस्ट्स में इसे “बिना दहेज की मिसाल” बताते हुए वायरल किया गया.


भारत में मचा बवाल
भारत में इस खबर पर प्रतिक्रियाएं काफी तीखी हैं. कई यूजर्स इसे “कजिन मैरिज” बताते हुए स्वास्थ्य जोखिम और सांस्कृतिक अंतर पर सवाल उठा रहे हैं. कुछ कमेंट्स में लिखा गया – “सिर्फ पाकिस्तानी ही कर सकते हैं ऐसा!” जबकि कुछ लोग सरल शादी और दहेज मुक्त आयोजन की तारीफ भी कर रहे हैं.
भारतीय सोशल मीडिया पर यह खबर “9 भाइयों ने 9 बहनों से शादी” के रूप में शेयर हो रही है, हालांकि वास्तव में ये चचेरे भाई-बहन हैं, सगे नहीं. पहले भी ऐसी घटनाओं पर फैक्ट चेक हो चुके हैं जहां सगे भाई-बहन वाली खबर गलत साबित हुई थी.
पाकिस्तान में कजिन मैरिज की परंपरा
पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम बहुल देशों में चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के बीच शादी आम मानी जाती है. चिकित्सा विज्ञान के अनुसार बार-बार ऐसी शादियों से आनुवंशिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. भारत में भी कुछ समुदायों में यह प्रथा है, लेकिन कानूनी और सामाजिक रूप से बहस का विषय रहता है.
परिवार का कहना है कि महंगाई के इस दौर में अलग-अलग शादियां करना मुश्किल था. इसलिए सबने मिलकर एक साथ फैसला लिया. इससे ना सिर्फ खर्च बच गया बल्कि पूरे परिवार का रिश्ता और मजबूत हो गया. उन्होंने इसे “सादगी और एकता”का संदेश बताया.
