दुर्ग। इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला यह मामला छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के थाना मोहन नगर का है। पिछले साल अप्रैल की घटना है…पुलिस को छह वर्ष की बालिका के लापता होने की सूचना प्राप्त हुई। सूचना मिलते ही पुलिस द्वारा समय गंवाए बिना बालिका की पतासाजी प्रारंभ की गई।

पुलिस टीमों द्वारा संभावित स्थानों पर तलाश की गई तथा उपलब्ध तकनीकी एवं मैदानी सूचनाओं के आधार पर बालिका की खोज की गई। आरोपी का नाम सोमेश यादव है। घटना अप्रैल 2025 की है। स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा है, जब बच्चों के खिलाफ ऐसे अपराध बाहरी लोगों के बजाय घर के सदस्य करने लगें तो बच्चियों आखिर कैसे सुरक्षित रहेंगी।


चतुर्थ एफटीएससी एवं विशेष न्यायालय (पॉक्सो) के अपर सत्र न्यायाधीश अनिष दुबे ने अपराध की क्रूरता, बच्ची की उम्र, आरोपी से उसका रिश्ता और वारदात के बाद साक्ष्य छिपाकर दूसरे व्यक्ति को फंसाने की कोशिश को देखते हुए इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम, रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामला माना है।

कोर्ट ने आरोपी सोमेश यादव को पॉक्सो एक्ट की धारा 5 (ड) और 5 (ढ) सहपठित धारा 6(1), भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 (1), 65 (2) और 238 (क) के आरोपों में दोषी पाया। सजा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (1), BNS की धारा 103(1) और 238 (क) के तहत सुनाई गई।

जानिए पूरा मामला

दिल दहला देने वाली घटना 6 अप्रैल 2025 की है। साढ़े छह साल मासूम रामनवमी पर कन्याभोज के लिए तैयार होकर अपनी बुआ-दादी के घर गई थी। आरोपी सोमेश उसका सगा चाचा था और करीब तीन महीने से इसी मकान की छत पर बने अधूरे कमरे में रह रहा था। अदालत ने कहा कि बच्ची अपने चाचा पर विश्वास करती थी और उसी भरोसे उसके बुलाने पर छत पर गई।

घटना के समय घर में बच्ची, आरोपी और उसकी बुआ-दादी के मौजूद होने की परिस्थितियाें को भी कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। बच्ची की चप्पल उसी घर में मिली। कोर्ट ने इसे इस निष्कर्ष की एक अहम कड़ी माना कि बच्ची वहां से बाहर नहीं गई थी।

कार में अचेत हालत में छोड़ा, अदालत ने माना तब सांसें चल रही थीं

कोर्ट के मुताबिक अपराध के बाद बच्ची को पास के प्लॉट में खड़ी अनुराग मेश्राम की कार में डाल दिया गया। मेडिकल साक्ष्य में बच्ची के शरीर पर फफोले निकल आए थे। डॉक्टरों ने बताया कि ऐसे निशान छोटे, बंद और गर्म स्थान में जीवित शरीर के रहने पर हो सकते हैं। इसी आधार पर अदालत ने माना कि कार में डाले जाने के समय बच्ची की मौत नहीं हुई थी, बल्कि अचेत अवस्था में जीवित थी।

अप्रैल की गर्मी में बंद कार में पड़े रहने और शॉक के कारण उसकी मौत हुई। कोर्ट ने माना कि छह साल, छह साल की बच्ची के साथ इस तरह के हिंसक कृत्य से मृत्यु होने की संभावना का आरोपी को ज्ञान था और इसी आधार पर हत्या का अपराध भी प्रमाणित पाया गया।

DNA ने जोड़ी अपराध की सबसे मजबूत कड़ी

फैसले में DNA और फॉरेंसिक साक्ष्यों की अहम भूमिका रही। बच्ची के रक्त का DNA आरोपी के इस्तेमाल वाली चादर ओर उसके अंडरवियर पर मिले रक्त से मेल खाया। बच्ची के कपड़ों, वेजाइनल स्लाइड और आरोपी की चादर पर मानव वीर्य मिलने तथा उसके DNA का आरोपी के DNA से मिलान होने को अदालत ने ठोस साक्ष्य माना। अदालत ने मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर बच्ची के दुष्कर्म करना पाया।

बचाव का तर्कों को कोर्ट ने सिरे से किया खारिज

बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि आरोपी बच्ची का सगा वाचा है और वह ऐसा अपराध नहीं कर सकता। यह भी कहा, बच्ची को मकान से कार तक ले जाते किसी ने नहीं देखा और CCTV में भी इसका फुटेज नहीं है। अदालत ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने DNA को आरोपी के खिलाफ सबसे ठोस प्रमाण माना और कहा कि दूसरे परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी आपस में जुड़ते हैं।

निर्दोष को फंसाने की रची साजिश, साक्ष्य छिपाया

कोर्ट ने सजा तय करते समय वारदात के बाद आरोपी के व्यवहार को भी गंभीर माना। बच्ची को कार में छिपाने के बाद आरोपी परिवार के साथ उसे खोजने का दिखावा करता रहा। रात में कार मालिक अनुराग मेश्राम ने बच्ची को देखकर लोगों को इसकी जानकारी दी तो आरोपी ने उसी पर आरोप लगाते हुए उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। अदालत ने इसे साक्ष्य छिपाने के साथ एक निर्दोष व्यक्ति को फंसाने की कोशिश माना।

इन परिस्थितियाें का कोर्ट ने अपने फैसले में किया उल्लेख

मृत्युदंड तय करते हुए अदालत ने पांच परिस्थितियों को प्रमुख माना-

घटना रामनवमी और कन्याभोज के दिन हुई।

बच्ची महज साढ़े छह साल की जबकि आरोपी 24 साल का था।

दोनों के बीच सगे चाचा-भतीजी का भरोसे का रिश्ता था।

अपराध की प्रकृति अत्यंत क्रूर थी और इसके बाद आरोपी ने बच्ची को दूसरे व्यक्ति की कार में डालकर अपराध छिपाने और उस व्यक्ति को फंसाने की कोशिश की।

दो अपराध में मृत्युदंड, साक्ष्य छिपाने पर पांच साल

अदालत ने पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (1) के तहत मृत्युदंड और 5 हजार रुपये जुर्माना तथा हत्या के लिए BNS की धारा 103 (1) में भी मृत्युदंड और 5 हजार रुपये जुर्माना सुनाया। BNS की धारा 238 (क) में साक्ष्य छिपाने के अपराध के लिए पांच वर्ष सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। सभी सजाएं साथ-साथ चलेगी।

परिवार को 7 लाख बतौर क्षतिपूर्ति मुआवजा का निर्देश

अदालत ने बच्ची के परिजनों को राज्य की पीड़ित प्रतिकर योजना से 7 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। यदि परिवार को पहले कोई अंतरिम क्षतिपूर्ति मिली है तो वह इस राशि में समायोजित होगी। जुर्माने की पूरी रकम भी अपील अवधि के बाद निर्धारित स्थिति में परिवार को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जाएगी।

पुष्टि के लिए मामला जाएगा हाई कोर्ट

विशेष अदालत के मृत्युदंड का यह फैसला तत्काल प्रभावी नहीं होगा। कानून के मुताबिक छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट से इसकी पुष्टि जरूरी है। अदालत ने पूरा प्रकरण पुष्टि के लिए हाई कोर्ट भेजने का आदेश दिया है।

पुलिस की त्वरित कार्रवाई

दुर्ग पुलिस की कार्रवाई का प्रमुख आधार यह रहा कि घटना के तत्काल बाद साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और उनके वैज्ञानिक परीक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। घटनास्थल का निरीक्षण कर सबूत संकलन की कार्रवाई की गई। आरोपी की पहचान कर उसे गिरफ्तार किया गया। आरोपी के बयान के आधार पर घटना से संबंधित वस्तुओं की बरामदगी व जब्ती की गई।

आरोपी के कपड़ों व घटनास्थल से प्राप्त सामग्रियों को सुरक्षित कर वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया। मृतिका के आवश्यक जैविक नमूने, कपड़े, स्वाब, बाल, नाखून व अन्य संबंधित सामग्री जब्त की गई। आरोपी व संबंधित व्यक्तियों के डीएनए के नमूने जब्त किए गए। घटनास्थल व आसपास के क्षेत्र में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज व डीवीआर को सुरक्षित कर जब्त किया गया।

एफएसएल व डीएनए परीक्षण के लिए भेजा गया। प्राप्त रिपोर्टों को चिकित्सकीय व परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ जाँच में शामिल किया गया। इस तरह पुलिस द्वारा मामले की जाँच कर तकनीकी सबूतों से पुष्ट किया गया। उपलब्ध साक्ष्यों का दस्तावेजीकरण कर कोर्ट में पेश किया गया।

दुर्ग पुलिस ने जारी किया प्रेसनोट

दुर्ग पुलिस ने प्रेस नोट जारी कर कहा कि प्रकरण बालिका के विरुद्ध गंभीर लैंगिक अपराध व हत्या से संबंधित है। बालिका की पहचान व मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए अपराध करने के तरीके से संबंधित अनावश्यक विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। जाँच में उपलब्ध साक्ष्यों व न्यायालयीन परीक्षण के आधार पर अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए।

मृत्युदंड की सजा

न्यायालय द्वारा प्रकरण को “विरलतम से विरलतम” श्रेणी का मानते हुए पॉक्सो अधिनियम की धारा 06(1) एवं भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के अंतर्गत मृत्युदंड तथा प्रत्येक धारा में 5,000 अर्थदंड अधिरोपित किया गया। इसके अतिरिक्त भारतीय न्याय संहिता की धारा 238(क) के अंतर्गत 5 वर्ष का सश्रम कारावास एवं 1,000 अर्थदंड से दंडित किया गया।

न्यायालयीन आदेश के अनुसार उक्त दंड एक साथ भुगताए जाने हैं तथा अर्थदंड अदा नहीं किए जाने की स्थिति में निर्धारित अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। मृत्युदंड की पुष्टि संबंधी प्रक्रिया उच्च न्यायालय बिलासपुर के समक्ष होगी।

पीड़ित परिवार के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण

प्रकरण में पुलिस की कार्रवाई का उद्देश्य केवल आरोपी की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पीड़ित परिवार को न्यायिक प्रक्रिया तक आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराते हुए प्रकरण को साक्ष्यपूर्ण एवं विधिसम्मत रूप से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना रहा। न्यायालय द्वारा मृतिका के परिजनों को राज्य सरकार की आहत प्रतिकर योजना के अंतर्गत 7,00,000 की क्षतिपूर्ति प्रदान किए जाने का निर्देश भी दिया गया है।

दुर्ग पुलिस की कार्रवाई

इस प्रकरण में दुर्ग पुलिस की कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि एक संवेदनशील बाल अपराध की सूचना प्राप्त होते ही त्वरित प्रतिक्रिया, बालिका की तलाश, तत्काल चिकित्सकीय सहायता, साक्ष्य संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण और प्रभावी विवेचना को प्राथमिकता दी गई।

पुलिस द्वारा घटनास्थल पर उपलब्ध छोटे से छोटे साक्ष्य को सुरक्षित रखने, जैविक साक्ष्यों का वैज्ञानिक परीक्षण कराने, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को संरक्षित करने तथा चिकित्सकीय एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को आपस में जोड़कर प्रकरण की विवेचना को साक्ष्य आधारित बनाया गया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि गंभीर अपराध से संबंधित तथ्य केवल आरोप के स्तर पर न रहें, बल्कि न्यायालयीन परीक्षण के लिए आवश्यक साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किए जा सकें।

यह कार्रवाई कानून के शासन, वैज्ञानिक पुलिसिंग, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण और जवाबदेह पुलिस व्यवस्था के प्रति दुर्ग पुलिस की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। महिला एवं बाल अपराधों के मामलों में पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ पीड़ित की गरिमा एवं पहचान की गोपनीयता बनाए रखना भी प्राथमिकता है।

सराहनीय कार्य

प्रकरण की त्वरित कार्यवाही के लिये पुलिस अधीक्षक महोदय द्वारा एक विशेष टीम उठी की गई थी जिसका नेतृत्व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक तंवर ,थाना प्रभारी निरीक्षक शिव चंद्रा द्वारा पतासाजी, घटनास्थल से साक्ष्य संरक्षण, वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य संकलन, आरोपी की गिरफ्तारी।

परीक्षण तथा न्यायालय में साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में थाना मोहन नगर के विवेचक सहित संबंधित पुलिस अधिकारी व कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। न्यायालय में इस प्रकरण में शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक रूपवर्षा दिल्लीवार का विशेष योगवान रहा है ।।

पुलिस की अपील

दुर्ग पुलिस आम नागरिकों से अपील करती है कि बच्चों के संबंध में किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि, गुमशुदगी अथवा अपराध की जानकारी मिलने पर तत्काल पुलिस को सूचना दें। विशेषकर बालिकाओं एवं बच्चों की सुरक्षा के मामलों में सूचना देने में देरी न करें। समय पर प्राप्त सूचना पुलिस को त्वरित कार्रवाई और साक्ष्यों के संरक्षण में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करती है।

दुर्ग पुलिस महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध अपराधों के मामलों में त्वरित, निष्पक्ष, संवेदनशील एवं वैज्ञानिक विवेचना सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही आम नागरिकों से अपेक्षा है कि वे बच्चों की सुरक्षा को सामूहिक जिम्मेदारी मानते हुए पुलिस का सहयोग करें।

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