
दुर्ग। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत मिलने वाले सरकारी फंड में कथित गबन और भारी अनियमितता का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दुर्ग कलेक्टर को नोटिस जारी किया है और निर्धारित समय सीमा के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
मिली जानकारी के अनुसार यह मामला निजी स्कूलों द्वारा फर्जी छात्र संख्या दिखाकर सरकारी राशि प्राप्त करने और दस्तावेजों में कथित हेरफेर करने से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि कुछ निजी शिक्षण संस्थानों ने आरटीई के तहत पात्र विद्यार्थियों की संख्या वास्तविक से अधिक दर्शाकर शासन से मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि में गड़बड़ी की है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि कई मामलों में ऐसे विद्यार्थियों के नाम पर भी राशि ली गई, जिनका वास्तविक रिकॉर्ड संदिग्ध है।

बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की शिकायत ई-बाल निदान पोर्टल के माध्यम से की गई थी। शिकायत मिलने के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने प्रारंभिक स्तर पर तथ्यों का परीक्षण किया और मामला गंभीर पाए जाने पर कार्रवाई शुरू की। आयोग के निदेशक वी. रामानधा रेड्डी की ओर से दुर्ग कलेक्टर को नोटिस जारी कर 20 दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है।


आयोग ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला होगा बल्कि बच्चों के शिक्षा अधिकार से भी जुड़ा गंभीर विषय माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
शिकायतकर्ता ने आयोग से जांच में सहयोग की बात कही है, लेकिन सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपनी पहचान गोपनीय रखने का अनुरोध भी किया है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि मामला संवेदनशील हो सकता है और इसमें कई प्रभावशाली लोगों या संस्थानों के नाम सामने आ सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक अब जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग मामले से जुड़े दस्तावेजों की जांच में जुट गए हैं। निजी स्कूलों द्वारा दाखिल छात्र रिकॉर्ड, बैंक भुगतान विवरण और आरटीई प्रतिपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों का मिलान किया जा रहा है। यदि जांच में अनियमितता साबित होती है, तो संबंधित स्कूलों के खिलाफ आर्थिक व कानूनी कार्रवाई की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
इस मामले के सामने आने के बाद जिले में शिक्षा व्यवस्था और आरटीई योजना के क्रियान्वयन पर भी सवाल उठने लगे हैं। शिक्षा के अधिकार कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि इस योजना में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा होता है तो इसका सीधा असर जरूरतमंद बच्चों के अधिकारों पर पड़ता है।
