दुनियाभर में कई ऐसी जनजातियां मौजूद हैं, जिनकी परंपराएं बेहद ही अजीब और चौंकाने वाली हैं. इस लिस्ट में भारत की भी कुछ जनजातियां शामिल हैं. आज हम आपको ट्राइब्स एंड ट्रेडिशंस (Tribes and Traditions) सीरीज के तहत तमिलनाडु में नीलगिरी की पहाड़ियों के बीच बसे एक ऐसे ही समुदाय के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी परंपराएं और मान्यताएं सुनकर किसी का भी सिर चकरा सकता है.
यह है ‘टोडा जनजाति (Toda Tribes)’. 2011 की जनगणना के मुताबिक, इनकी कुल आबादी महज दो हजार के करीब बची है. टोडा समुदाय के लोग द्रविड़ भाषा-परिवार की अपनी एक खास ‘टोडा भाषा’ बोलते हैं, जो इतनी जटिल है कि इसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं. लेकिन इस समाज की सबसे हैरान करने वाली बात इनकी उत्पत्ति की कहानी है.
इनकी मान्यता है कि उनके देवता ‘ओन’ ने सबसे पहले पृथ्वी से पवित्र भैंसों को बाहर निकाला था और जब आखिरी भैंस बाहर निकल रही थी, तो उसकी पूंछ पकड़कर पहले ‘टोडा पुरुष’ का जन्म हुआ. बाद में उसी पुरुष की पसली से पहली महिला बनाई गई. यही वजह है कि टोडा समाज के जीवन का केंद्र ही ‘भैंस’ है और वे इसे सबसे पवित्र जीव मानते हैं.
टोडा जनजाति की बस्तियों को ‘मंड’ कहा जाता है, जो किसी फिल्म के सेट जैसी लगती हैं. यहां ‘डोगल्स’ नामक आधे बैरल या ढोल के आकार की अनोखी झोपड़ियां होती हैं. ये झोपड़ियां बांस से बनी होती हैं और इनकी छत सूखी घास से ढकी होती है. ताज्जुब की बात यह है कि इन झोपड़ियों का दरवाजा जानबूझकर इतना छोटा रखा जाता है कि इंसान को भी अंदर जाने के लिए रेंगना पड़ता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि रात के समय जंगली जानवर अंदर न घुस सकें.
टोडा जनजाति की सामाजिक संरचना ऐतिहासिक रूप से ‘बहुपति प्रथा (Polyandry)’ पर आधारित थी यानी एक ही परिवार के सभी भाई मिलकर एक ही महिला से शादी करते थे. जब महिला गर्भवती होती थी, तो एक खास समारोह में उसे लकड़ी का बना धनुष-बाण दिया जाता था. यह रस्म तय करती थी कि आने वाले बच्चे का सामाजिक पिता कौन होगा.
हालांकि, आधुनिक समय और शिक्षा के प्रभाव से अब यह प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है. यह समाज दो वर्गों ‘तेइवालिओल’ और ‘तरथरोल’ में बंटा हुआ है, जिनके अपने-अपने रीति-रिवाज और धार्मिक स्थल होते हैं. सदियों से ये लोग नीलगिरि के अन्य समुदायों जैसे बडागा और कोटा के साथ अनाज और औजारों के बदले दूध और मक्खन का लेन-देन करते आए हैं. इनका पूरा धर्म भैंसों और दूध के इर्द-गिर्द घूमता है. इनके लिए भैंसों से दूध निकालने वाली जगह किसी मंदिर से कम नहीं है.
दूध दुहना और मक्खन मथना इनके लिए केवल काम नहीं, बल्कि एक पवित्र अनुष्ठान है. इन कार्यों के लिए विशेष पुजारी नियुक्त किए जाते हैं, जिन्हें बहुत ही कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है. उदाहरण के तौर पर इन पुजारियों को नदी पार करने के लिए पुल का इस्तेमाल करना सख्त मना है. टोडा धर्म में लगभग 1800 देवी-देवता माने जाते हैं, जिनमें देवी टोकिस्य और पाताल के देवता ओन सबसे प्रमुख हैं.
इनके सबसे महत्वपूर्ण समारोहों में ‘कोना शास्त्र (बछड़े की बलि)’ और अंतिम संस्कार शामिल हैं, जहां मृतक के साथ परलोक जाने के लिए भैंसों की बलि दी जाती है. खान-पान के मामले में टोडा लोग पारंपरिक रूप से पूरी तरह शाकाहारी होते हैं. इनका मुख्य भोजन चावल है, जिसे ये ताजे दूध, दही और मक्खन के साथ खाते हैं. टोडा जनजाति का पूरा क्षेत्र अब नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है, जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है.
क्यों था बहुपति प्रथा का चलन?
टोडा जनजाति में बहुपति प्रथा (Polyandry) के पीछे गहरे सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक कारण रहे हैं. यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नीलगिरि की कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की एक रणनीति थी. इसके तहत जमीन और संपत्ति का बंटवारा रोकना और सामाजिक एकजुटता शामिल है. दरअसल, टोडा समाज में भैंसें ही मुख्य संपत्ति होती हैं.
यदि हर भाई अलग शादी करता और अपने अलग परिवार बसाता, तो परिवार की सीमित जमीन और भैंसों का बंटवारा हो जाता. एक ही महिला से शादी करने के कारण परिवार की संपत्ति एक ही जगह केंद्रित रहती थी और भाइयों के बीच विवाद नहीं होता था. साथ ही, एक ही पत्नी होने से भाइयों के बीच ईर्ष्या कम होती थी और वे एक इकाई के रूप में काम करते थे. बच्चों का पालन-पोषण भी सामूहिक जिम्मेदारी मानी जाती थी. इसके अलावा महिलाओं की कम आबादी भी एक वजह थी.