सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन दिनों एक चौंकाने वाली कहानी तेजी से वायरल हो रही है। रेडिट पर एक यूजर ने अपना नियर डेथ एक्सपीरियंस (Near Death Experience – NDE) साझा किया है, जिसमें उसने दावा किया कि वह मौत के करीब पहुंचकर “दूसरी दुनिया” का अनुभव कर लौटा। खास बात यह है कि उसने शरीर में वापसी के अनुभव को “नर्क जैसा दर्दनाक” बताया। यह पोस्ट r/NDE और r/AskReddit जैसे फोरम पर चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां लोग मौत के बाद की स्थिति और आत्मा के अस्तित्व पर बहस कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला? रेडिट यूजर का दावा
यूजर के अनुसार, गंभीर मेडिकल स्थिति के दौरान उसे लगा कि वह अपने शरीर से अलग हो गया है। उसने खुद को ऊपर तैरते हुए देखा और गहरी शांति का अनुभव किया। लेकिन जब वह दोबारा शरीर में लौटा तो अनुभव बेहद पीड़ादायक था। उसने लिखा कि वापसी के दौरान ऐसा लगा जैसे उसे “आग के रास्ते से धकेलकर” शरीर में वापस डाला जा रहा हो। पूरा शरीर जलन और सुई जैसी चुभन से भर गया था।
“शरीर में लौटना आग से गुजरने जैसा था”
यूजर ने अपने अनुभव को विस्तार से बताते हुए कहा:
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शरीर में लौटते समय तेज जलन महसूस हुई
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एहसास हुआ जैसे आग लगाने वाली चींटियां पूरे शरीर पर काट रही हों
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शरीर अचानक बहुत छोटा और भारी लगने लगा
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वापसी कई बार हुई — अलग होना और फिर वापस खींच लिया जाना
उसने आशंका जताई कि यह असर शायद डॉक्टरों द्वारा दिए गए इंजेक्शन, दवाओं या एड्रेनालिन के कारण भी हो सकता है, लेकिन अनुभव इतना तीव्र था कि उसे “नर्क जैसा” लगा।
नियर डेथ एक्सपीरियंस (NDE) क्या होता है?
नियर डेथ एक्सपीरियंस वह स्थिति है जब व्यक्ति क्लिनिकल डेथ के करीब पहुंच जाता है — जैसे हार्ट अटैक, गंभीर दुर्घटना या कोमा के दौरान। कई लोग ऐसे अनुभवों में समान बातें बताते हैं:
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शरीर से बाहर निकलने का अहसास
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तेज रोशनी या टनल दिखना
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गहरी शांति का अनुभव
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मृत परिजनों से मिलने का दावा
हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनुभव दिमाग में ऑक्सीजन की कमी, रसायनिक बदलाव और न्यूरोलॉजिकल गतिविधियों के कारण पैदा होने वाले भ्रम भी हो सकते हैं।
सोशल मीडिया पर बहस तेज
इस वायरल पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की राय सामने आई है। कुछ लोग इसे आत्मा और मृत्यु के बाद जीवन का संकेत मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे मेडिकल और न्यूरोसाइंस से जुड़ा प्रभाव बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे अनुभवों को व्यक्तिगत दावे के रूप में देखना चाहिए, न कि अंतिम सत्य के रूप में।