इजिप्ट के वेस्टर्न डेजर्ट में एक ऐसा रहस्य छिपा है जो सुनकर किसी का भी दिमाग हिल जाता है. यहां रेत के बीच सैकड़ों विशाल व्हेल की हड्डियां मिली थी. जगह का नाम है वादी अल-हितन, जिसे अंग्रेजी में ‘वैली ऑफ व्हेल्स’ या ‘व्हेल वैली’ कहते हैं.
यहां रेत से निकली ये हड्डियां 40 मिलियन साल पुरानी है और बताती हैं कि कैसे व्हेल्स पहले जमीन पर चलती थी और फिर समुद्र की रानी बन गईं. यह जगह काहिरा से करीब 150 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में फैयूम गवर्नरेट में है. अब बड़ा सवाल ये है कि आखिर रेत में व्हेल आई तो आई कैसे?
वर्ल्ड हेरिटेज घोषित
2005 में इसे यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया क्योंकि यहां दुनिया की सबसे ज्यादा और सबसे अच्छी क्वालिटी वाली प्राचीन व्हेल फॉसिल्स है. अब तक 400 से ज्यादा व्हेल स्केलेटन मिल चुके हैं और कई अभी भी रेत में दबी हुई है. मुख्य रूप से दो तरह की व्हेल्स की हड्डियां हैं– बेसिलोसेरस और डोरुडॉन. बेसिलोसेरस 21 मीटर तक लंबी होती थी, जबकि डोरुडॉन 3-5 मीटर की. सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इन व्हेल्स के पैर थे!
छोटे-छोटे हिडन लिम्ब्स, पैर और उंगलियां, जो आज की व्हेल्स में बिल्कुल नहीं होती. ये आर्कियोसेती व्हेल्स हैं, जो जमीन से समुद्र में ट्रांजिशन वाली स्टेज दिखाती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, 50 मिलियन साल पहले व्हेल्स के पूर्वज जमीन पर रहने वाले स्तनधारी थे, जैसे आज के हिप्पो या भेड़िए. धीरे-धीरे वे पानी में ज्यादा समय बिताने लगे, पैर छोटे होते गए और फ्लिपर्स बन गए. वादी अल-हितन इस बदलाव का सबसे साफ सबूत है.
तो ये व्हेल्स रेगिस्तान में कैसे पहुंचीं?
इसका जवाब है– लाखों साल पहले यहां समुद्र था! इयोसीन एपॉक (करीब 56-34 मिलियन साल पहले) में ये इलाका टेथिस ओशन का हिस्सा था, जो एक उथला समुद्र था. यहां व्हेल्स तैरती थीं, शिकार करती थीं और मरने पर समुद्र तल पर दफन हो जाती थीं. उनकी हड्डियां गाद में दब गईं और फॉसिल बन गईं. समय के साथ टेक्टॉनिक प्लेट्स की वजह से जमीन ऊपर उठी, समुद्र सूख गया और ये इलाका रेगिस्तान बन गया. हवा और रेत की इरोजन ने सदियों तक इन फॉसिल्स को ढक रखा, लेकिन अब रेत उड़ने से ये बाहर आ रही हैं.
कई स्केलेटन पूरी तरह से दिखते हैं– जैसे कोई विशालकाय मछली रेत में सो रही हो. यहां सिर्फ व्हेल्स नहीं, सी काउ, शार्क, क्रोकोडाइल, टर्टल और फिश की हड्डियां भी मिलती हैं. एक फॉसिल में बेसिलोसेरस के पेट में दूसरी मछलियों के अवशेष मिले, जो बताते हैं कि वे कार्निवोरस थी. यह जगह 1980 के दशक में खोजी गई थी. 1989 में पहली बार पैर वाली व्हेल फॉसिल मिली, जिसने दुनिया को चौंका दिया था. 2015 में दुनिया की सबसे पूरी बेसिलोसेरस फॉसिल मिली, जो 18 मीटर लंबी थी