रावण को सुदर्शन चक्र से भी नहीं हरा पाए विष्णु, फिर उनके अवतार ने कैसे हराया?

भारतीय पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु (Vishnu) को ब्रह्मांड के पालक (Preserver) के रूप में पूजा जाता है और उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र सुदर्शन चक्र (Sudarshan Chakra) माना जाता है, जिससे कोई भी शत्रु बच नहीं सकता. दूसरी ओर रावण (Ravana) एक प्रकांड विद्वान, परम शिव भक्त और एक अजेय योद्धा था, जिसे देवताओं से भी युद्ध में पराजित करना कठिन था.

ऐसे में कई लोगों के जेहन में सवाल उठता है कि भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से रावण को क्यों नहीं मार पाए? उसे मारने के लिए उन्हें भगवान राम के रुप में अवतार क्यों लेना पड़ा? सोशल मीडिया पर भी लोग ऐसे सवाल उठाते हैं. हाल ही में एक कोरा (Qoura) यूजर ने भी इस सवाल को पूछा है, जो वायरल हो रहा है. इस प्रश्न का लोग जवाब भी दे रहे हैं.

इस सवाल पर कई लोगों ने भगवान राम द्वारा रावण वध की वजह को बताया है, तो कई लोगों ने उनके पूर्वजों की चर्चा भी की है, जो रावण को मारते-मारते रह गए थे. कनाडा में रहने वाले राम चरण ने अपने जवाब में लिखा है कि भगवान विष्णु ने कभी भी रावण से सीधी लड़ाई नहीं की, ऐसे में सुदर्शन चक्र चलाने की कोई मतलब ही नहीं बनता.

हालांकि, उनके आंशिक अवतार माने जाने वाले मंधाता और कार्तवीर्य ने रावण को बुरी तरह हराया और लगभग मार ही डाला था. यहां तक कि वामन अवतार ने भी उसे बाली के राज्य से बाहर निकाल दिया था, जब रावण ने पाताल लोक पर हमला किया था. वह इंद्र थे, जिन्होंने विष्णु चक्र चलाया था जो रावण के कवच को नुकसान नहीं पहुंचा सका. वेदों में सुदर्शन चक्र को विष्णु की संकल्प शक्ति के रूप में पूजा जाता है. ब्रह्मा जी ने भी अथर्ववेद में इसकी महिमा का वर्णन किया है.

वहीं, अर्पण दुबे ने लिखा है कि कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि भगवान विष्णु के पास रावण को हराने की शक्ति नहीं है. विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से रावण को एक बार में मार सकते थे. लेकिन रावण ने ब्रह्मा जी से एक वरदान लिया था कि उसे देवता, राक्षस, इंद्र आदि कोई भी मार नहीं सकता. रावण ने इसके लिए कड़ी तपस्या की थी.

हालांकि, इस सब में रावण इंसानों और जानवरों के बारे में भूल गया, उसने सोचा कि वे छोटे हैं और पहले से ही उसे मारने में सक्षम नहीं हैं. दूसरी तरफ, अगर विष्णु जी रावण को मारते तो यह ब्रह्मा जी का अपमान होता. रेघुवरन ने भी इस बात की पुष्टी की. उन्होंने लिखा है कि रावण की सबसे बड़ी ताकत उसके ब्रह्मा के दिव्य कवच और उसकी असाधारण पुनर्जीवन शक्ति में निहित थी. इन दोनों शक्तियों के कारण वह लगभग अजेय था, यहां तक कि विष्णु सहित अन्य देवता भी उसे पराजित नहीं कर सकते थे.

किस धर्मग्रंथ में है रावण के वरदान का जिक्र?

राम-रावण के युद्ध के बारे में तो सभी जानते हैं. लेकिन रावण को ब्रह्मा जी ने जो वरदान दिया था, जिसकी वजह से उसे गरुण, सर्प, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवता नहीं मार सकते थे, वो किस धर्मग्रंथ में है? अक्सर लोगों के जेहन में सवाल उठता है. ऐसे में बता दें कि इस वरदान की चर्चा कई हिंदू धर्मग्रंथों में है. लेकिन विस्तार से बाल्मिकी जी द्वारा रचित रामायण में है.

इस रामायण के दशम सर्ग के तिरेसठ से छाछठवें (63-66) पेज के बीच विस्तार से बताया गया है. ब्रह्मा जी को 10 हजार सालों की कड़ी तपस्या से प्रसन्न करने के बाद रावण कहता है कि मृत्यु से बढ़कर कोई शत्रु नहीं, आप मुझे अमरत्व दें. इस पर ब्रह्मा जी कहते हैं कि ऐसा संभव नहीं है. तब रावण कहता है कि मैं इंसानों को तुच्छ समझता हूं. इसलिए मुझे गरुण, सर्प, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवता नहीं मार सकते, ऐसा वरदान दें. इसी वजह से भगवान विष्णु को इंसान के रुप में अवतार लेना पड़ा और तब रावण का अंत हुआ.

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