इंसानी सभ्यता के विकास की दौड़ में जहां हम चांद और मंगल तक पहुंच गए हैं, तो दूसरी ओर दुनियाभर में कई ऐसी जनजातियां हैं, जिनके बारे में ही बहुत कम लोगों को पता है. अमेजन के घने जंगलों से लेकर अंडमान आइलैंड तक रहने वाले ये ट्राइब्स आज भी मुख्यधारा से कटे हुए हैं. आज हम आपको एक ऐसी ही भारतीय जनजाति के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर रहती है.
इस ट्राइब का नाम जारवा (Jarawa Tribes) है. वैज्ञानिकों और इतिहासकारों का मानना है कि यह कबीला पिछले 55,000 सालों से इन जंगलों में रह रहा है. अफ्रीका से निकली मानव सभ्यता की यह सबसे पुरानी जीवित कड़ियों में से एक है. साल 1990 के दशक तक इस जनजाति का बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं था और वे पूरी तरह से प्रकृति की गोद में अपनी शर्तों पर जी रहे थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिक दुनिया इनके करीब पहुंची, इनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे.
इंटरनेट पर उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक, जारवा ट्राइब्स से जुड़े लोग आज भी आदिम तरीके से अपनी लाइफ को जीते हैं. वे अपने खान-पान के लिए खेती नहीं करते, बल्कि पूरी तरह शिकार और जंगल से मिलने वाले फल-फूलों पर निर्भर हैं. धनुष-बाण इनके मुख्य हथियार हैं, जिनसे वे जंगली सुअर, कछुओं और मछलियों का शिकार करते हैं. उ
नके पास जंगल की जड़ी-बूटियों का इतना गहरा ज्ञान है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी उसे देखकर हैरान रह जाता है. लेकिन विडंबना देखिए, जिस बाहरी दुनिया को हम सभ्य कहते हैं, उसी ने इन मासूम लोगों को एक तमाशा बना दिया. जारवा जनजाति के साथ होने वाली बदसलूकी का सबसे घिनौना चेहरा साल 2012 में तब सामने आया, जब एक ब्रिटिश अखबार ने ह्यूमन सफारी का भंडाफोड़ किया. एक वीडियो लीक हुआ, जिसमें दिखाया गया कि कैसे कुछ पुलिसकर्मी और गाइड जारवा महिलाओं को खाने के बदले नाचने पर मजबूर कर रहे थे.

जंगली जानवरों और मछली का शिकार इनका मुख्य भोजन है.
बाहरी बीमारियां बनीं जारवा कबीले के लिए काल
बाहरी लोग इस जनजाति के लोगों को चिड़ियाघर के जानवरों की तरह देखते थे और बिस्कुट या फल फेंककर उनकी तस्वीरें खींचते थे. यह एक पूरी संस्कृति का अपमान था. इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की काफी किरकिरी हुई और सुप्रीम कोर्ट ने अंडमान ट्रंक रोड पर पर्यटकों की आवाजाही को लेकर कड़े निर्देश दिए.
हालांकि, जारवा लोगों के लिए बाहरी दुनिया केवल अपमान ही नहीं, बल्कि मौत का पैगाम भी लेकर आई. चूंकि ये लोग हजारों सालों से अलग-थलग रहे हैं, इसलिए इनके शरीर में आम बीमारियों जैसे खसरा, फ्लू या सामान्य सर्दी-जुकाम से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता नहीं है.
बाहरी लोगों के संपर्क में आने से कई बार इन कबीलों में महामारियां फैली हैं, जिससे इनकी आबादी तेजी से घटी है. एक समय हजारों की संख्या में रहने वाले जारवा अब मात्र 400 से 500 के बीच सिमट कर रह गए हैं. सरकार ने अब इनके क्षेत्र को रिजर्व एरिया घोषित कर दिया है, जहां किसी भी बाहरी व्यक्ति का बिना अनुमति जाना और इनकी तस्वीरें लेना दंडनीय अपराध है.
अंडमान ट्रंक रोड से बढ़ीं मुश्किलें?
जारवा लोगों के जीवन में सबसे बड़ा दखल अंडमान ट्रंक रोड (ATR) के रूप में देखा जाता है. यह सड़क जारवा रिजर्व के बीचों-बीच से होकर गुजरती है. हालांकि, यह सड़क स्थानीय लोगों के लिए लाइफलाइन मानी जाती है, लेकिन जारवा कबीले के लिए यह उनके संसाधनों की चोरी और सांस्कृतिक पतन का रास्ता बन गई है.
सड़क के कारण शिकारियों का प्रवेश आसान हो गया है, जो जारवा लोगों के भोजन (जंगली सुअर और मछलियों) की चोरी करते हैं. साथ ही, शराब और तंबाकू जैसी आधुनिक बुराइयां भी इनके बीच पहुंचने लगी हैं, जो इनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. जारवा जनजाति का संरक्षण केवल एक कबीले को बचाने की बात नहीं है, बल्कि यह मानव इतिहास की उस विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी है जिसे दोबारा कभी नहीं बनाया जा सकेगा.