मछली पकड़ने नदी में एक साथ कूदे हजारों मछुआरे, तिल रखने की भी नहीं दिखी जगह! आखिर कहां का है ये नजारा?

मछली पकड़ना कुछ लोगों का शौक होता है तो कुछ लोगों की जरूरत. पर क्या आपने कभी मछली पकड़ने को कंप्टीशन की तरह देखा है? हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें हजारों मछुआरे एक साथ नदी में कूदकर मछली पकड़ते नजर आ रहे हैं. ये नजारा जितना भव्य है, उतना ही हैरान करने वाला भी है.

ऐसा लग रहा है कि ये लोग किसी प्रतियोगिता का हिस्सा हैं और जल्द से जल्द मछली पकड़ लेना चाहते हैं. तो सवाल ये उठता है कि आखिर ये नजारा कहां का है? चलिए आपको बताते हैं. इंस्टाग्राम अकाउंट @theniyifagbemi पर हाल ही में एक वीडियो पोस्ट किया गया, जो नाइजीरिया की माटन फाडा नदी का है.

ये नजारा नाइजीरिया के उत्तर पश्चिमी इलाके में बसे शहर आर्गुंगू का है. यहां पर बेहद लोकप्रिय आर्गुंगू फिशिंग फेस्टिवल हुआ है. इस साल 11 फरवरी से 14 फरवरी तक ये फेस्टिवल यहां पर चला जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया. आपको बता दें कि माटन फाडा नदी युनेस्को हेरिटेज साइट है. ये नदी खूबसूरत हरे-भरे इलाकों के बीच से बहती है.

मछुआरों ने पकड़ी मछलियां

इस फेस्टिवल को देखने के लिए राष्ट्रपति बोला टिनुबू भी बीते शनिवार को शामिल हुए. सैकड़ों लोग फेस्टिवल को देखने के लिए जुटे थे, जिसमें सबसे आकर्षक होती है मछली पकड़ने की प्रतियोगिता. मछुआरे इस दौरान सबसे बड़ी मछली पकड़कर अवॉर्ड जीतते हैं.

पर मछली पकड़ने के लिए उन्हें ट्रेडिशनल टूल्स का सहारा लेना पड़ता है, जिसमें हाथ से बने जाल, या फिर सूखी लौकी शामिल है जिससे मछली पकड़ी जाती है. कई मछुआरे तो अपने खाली हाथों से मछली पकड़ते दिखाई दे जाते हैं. नदी में नाव, जाल और मछुआरे हर ओर नजर आ रहे थे.

कई साल पहले शुरू हुआ था त्योहार

इस साल इस प्रतियोगिता के जो विजेता रहे, उन्होंने 59 किलो की मछली पकड़ी. उन्हें कैश प्राइज भी दिया गया. कई मछुआरे यहां से मछली पकड़ने के बाद पास की मार्केट में उसे बेच देते हैं, जिससे लोकल इकोनॉमी को बढ़ावा मिलता है. ये नदी पूरे साल मछली पकड़ने के लिए बंद रहती है. इसे पानी के प्रमुख या सारकिन रूवा की देखरेख में रखा जाता है जो एक पारंपरिक नेता होता है.

आपको बता दें कि ये त्योहार 1934 से शुरू हुआ था क्योंकि लोग सुन्नी इस्लामी साम्राज्य सोकोटो खिलाफत और आर्गुंगे के बीच संधि का जश्न मना रहे थे. कई सालों बाद ये एकता का त्योहार बन गया. साल 2010 में सुरक्षा कारणों की वजह से और खराब व्यवस्था के चलते इसे बंद कर दिया गया था. 2020 में ये शुरू हुआ पर फिर से बंद कर दिया गया. अब इस साल इसे एक बार फिर शुरू किया गया है. 39 डिग्री सेल्सियस तापमान होने के बावजूद भी लोगों ने बढ़चढ़कर इसमें हिस्सा लिया.

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