आधुनिकता की दौड़ में दुनिया मंगल ग्रह पर पहुंचने की तैयारी कर रही है, लेकिन धरती पर आज भी कुछ ऐसे कोने मौजूद हैं जहां समय सदियों पहले ही रुक गया है. इंडोनेशिया के पापुआ प्रांत के बेहद घने और दलदली जंगलों के बीच रहने वाली कोरोवाई जनजाति एक ऐसी ही दुनिया का हिस्सा है. इन लोगों को दुनिया के आखिरी नरभक्षी (Last Cannibals) के तौर पर जाना जाता है.
लगभग 3,000 की आबादी वाली यह जनजाति अपनी अनोखी जीवनशैली और खौफनाक मान्यताओं के कारण हमेशा चर्चा में रहती है. कोरोवाई लोगों के बारे में बाहरी दुनिया को पहली बार 1974 में तब पता चला, जब एक डच मिशनरी ने अनजाने में इनकी खोज की थी. इससे पहले ये लोग पूरी तरह दुनिया से कटे हुए थे और इन्हें यह भी नहीं पता था कि जंगल के बाहर कोई इंसानी बस्ती मौजूद है.
कोरोवाई जनजाति की सबसे बड़ी खासियत उनके घर हैं, जिन्हें रूमा टिंगी (Rumah Tinggi) कहा जाता है. ये लोग जमीन पर नहीं बल्कि 40 से 100 फीट की ऊंचाई पर पेड़ों की चोटियों पर अपने घर बनाते हैं. इतनी ऊंचाई पर घर बनाने के पीछे कई कारण हैं, एक तो जंगली जानवरों और मच्छरों से बचाव, दूसरा बाढ़ से सुरक्षा और सबसे अहम कारण है बुरी आत्माओं का डर.
कोरोवाई लोगों का मानना है कि रात में जंगल में बुरी आत्माएं घूमती हैं और उनसे बचने के लिए ऊंचाई पर रहना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है. ये घर लकड़ी, बांस और पत्तों से बनाए जाते हैं और इनमें जाने के लिए लकड़ी के तने पर खांचे बनाकर सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है. नरभक्षण को लेकर कोरोवाई जनजाति की मान्यताएं बेहद हैरान करने वाली हैं. ये लोग किसी भी इंसान को नहीं मारते, बल्कि ये सिर्फ खाखुआ (Khakhua) को मारते हैं.
इस जनजाति के लोगों की मान्यता है कि खाखुआ एक डायन या बुरी आत्मा होती है, जो इंसान के शरीर में घुसकर उसे अंदर से खाना शुरू कर देती है. जब कोई व्यक्ति बीमार होकर मरने वाला होता है, तो वह उस व्यक्ति का नाम लेता है, जिसे वह खाखुआ मानता है. व्यक्ति की मौत के बाद कबीले के लोग उस कथित खाखुआ को पकड़ते हैं, उसे मारते हैं और फिर उसका मांस खा जाते हैं.
उनका मानना है कि ऐसा करने से वे बुरी आत्मा का खात्मा कर रहे हैं. हालांकि, पिछले कुछ दशकों में बाहरी संपर्क और सरकार की सख्ती के बाद यह प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है. कोरोवाई समाज में महिलाओं की स्थिति आज भी बेहद चुनौतीपूर्ण है. यहां का समाज पूरी तरह से पुरुष प्रधान है. महिलाओं का मुख्य काम सिर्फ बच्चे पैदा करना, घर संभालना और सागो (Sago) के पेड़ों से स्टार्च निकालकर खाना तैयार करना है.
पुरुषों के लिए खाने के लिए शिकार करना और रहने के लिए घर बनाना मुख्य कार्य है, जबकि महिलाएं दिन भर कड़ी मेहनत करती हैं. पुरुषों और महिलाओं के रहने के कमरे भी अक्सर अलग-अलग होते हैं. यहां बहुविवाह (Polygamy) की प्रथा भी प्रचलित है और कई बार महिलाओं को कड़ी शारीरिक सजाओं का सामना भी करना पड़ता है.
90 के दशक में जब बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ा, तो इस क्षेत्र में पर्यटन और मिशनरी गतिविधियों के साथ-साथ वेश्यावृत्ति जैसी समस्याएं भी पनपने लगी थीं. लेकिन 1999 के आसपास इंडोनेशियाई सरकार ने कड़े कदम उठाए और इन गतिविधियों पर लगाम लगाई. आज ये लोग धीरे-धीरे आधुनिक दुनिया के संपर्क में आ रहे हैं, टी-शर्ट पहनने लगे हैं और कुछ लोग अब सरकार द्वारा बनाए गए गांवों में भी रहने लगे हैं. लेकिन जंगल के अंदर आज भी कई परिवार ऐसे हैं जो पुरानी परंपराओं को ही अपना जीवन मानते हैं.