
Korba mystery stone : छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के एक गांव में बारात के पत्थर बनने की कथा परंपरा बनी हुई है. शादी से पहले इन पत्थरों की पूजा और सूर्योदय से पहले विदाई की रस्म जारी की प्रथा है.
कोरबा. कोरबा जिले के एक गांव में स्थित एक रहस्यमयी स्थान आज भी लोगों की आस्था और परंपरा का केंद्र बना हुआ है.गांव के प्रवेश द्वार के पास कतारबद्ध रखे पत्थरों को यहां के लोग दूल्हा-दुल्हन और बारातियों के रूप में पूजते हैं.मुख्य पत्थरों को दूल्हा-दुल्हन का प्रतीक माना जाता है, जबकि आसपास मौजूद अन्य पत्थरों को बारातियों की संज्ञा दी गई है.ग्रामीणों के बीच यह मान्यता प्रचलित है कि ये पत्थर कभी जीवित इंसान थे, जो एक अनहोनी के कारण पत्थर में तब्दील हो गए.
भूल या परंपरा के उल्लंघन के कारण

स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्षों पहले एक बारात इस मार्ग से गुजर रही थी.रात होने पर बारात ने इसी स्थान को विश्राम के लिए चुना और वहीं रुककर भोजन किया.लेकिन सुबह होते ही, जैसे ही सूर्य की पहली किरण उन पर पड़ी, दूल्हा-दुल्हन सहित पूरी बारात पत्थर की मूर्तियों में बदल गई.ग्रामीणों का मानना है कि यह सब किसी भूल या परंपरा के उल्लंघन के कारण हुआ.


गांव के लोग बताते हैं कि यह कहानी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है और लोग इसे आज भी सच मानते हैं. गांव में हर शादी से पहले इन पत्थरों की विधिवत पूजा की जाती है.किसी भी बारात के गुजरने से पहले यहां नारियल चढ़ाना अनिवार्य माना जाता है.इतना ही नहीं, आज भी इस मान्यता के चलते गांव में बेटियों की विदाई सूर्योदय से पहले ही कर दी जाती है, ताकि कोई अनहोनी न हो.
हर शादी की शुरुआत इसी स्थान पर पूजा-अर्चना से होती
गांव के बैगा यानी की पुजारी टिकैत राम बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही इस परंपरा को चलते देखा है.उनके अनुसार, हर शादी की शुरुआत इसी स्थान पर पूजा-अर्चना से होती है.ग्रामीण इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि सुबह होने से पहले ही विवाह संबंधी सभी रस्में पूरी कर ली जाएं.टिकैत राम का यह भी दावा है कि इन पत्थरों की ऊंचाई समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है.यदि कोई व्यक्ति इन पर सिंदूर का निशान लगाकर अगले वर्ष देखे, तो ऊंचाई में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है.
हालांकि, इस कथा के पीछे का वास्तविक सच क्या है, इसकी कोई ठोस जानकारी किसी के पास नहीं है.इसके बावजूद, गांव के लोग इस परंपरा और मान्यता को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं.आधुनिक समय में भी ग्रामीण किसी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहते और सदियों पुरानी इस मान्यता को आज भी जीवित रखे हुए हैं.
