जन्म पर आंसू, मौत पर जश्न! इस जगह की उल्टी परंपरा सुनकर रह जाएंगे दंग...

सातिया जनजाति की अनोखी सोच – उल्टी दुनिया, उल्टा नजरिया

राजस्थान की सातिया (Satiyaa) जनजाति अपनी परंपराओं के कारण दुनियाभर में चर्चा का विषय है। जहां दुनिया जन्म को खुशी और मौत को दुख मानती है, वहीं इस जनजाति में जन्म शोक का कारण और मृत्यु उत्सव का अवसर होती है।
यह अनोखी मान्यता जीवन और मृत्यु के अर्थ पर गहरी सोच को जन्म देती है।

मौत पर ढोल-नगाड़े, नृत्य और मिठाइयां – क्यों मनाया जाता है उत्सव?

सातिया समुदाय में मृत्यु को आत्मा की मुक्ति माना जाता है। उनका विश्वास है कि इंसान मरकर ‘भौतिक जीवन की कैद’ से मुक्त हो जाता है और नए लोक में प्रवेश करता है, जो खुशी का अवसर है।

इसलिए—

  • पूरे गांव में ढोल-नगाड़ों की आवाज गूंजती है

  • लोग रात भर नाचते-गाते रहते हैं

  • मिठाइयां और सूखे मेवे बांटे जाते हैं

  • शराब का सेवन कर चिता बुझने तक उत्सव चलता है

अंतिम यात्रा को सम्मानजनक “आखिरी सफर” माना जाता है, और राख ठंडी होने के बाद सामूहिक भोज भी होता है।

जन्म पर शोक – क्यों माना जाता है दुखद अवसर?

सातिया जनजाति की मान्यता है कि जीवन दुखों और पापों से भरी एक सजा है।
इसलिए किसी बच्चे का जन्म इस बात का संकेत माना जाता है कि आत्मा फिर से कष्टों की दुनिया में लौट आई है।

इसी वजह से—

  • माहौल गमगीन हो जाता है

  • घरों में सन्नाटा छा जाता है

  • कई बार सामान्य खाना भी नहीं बनता

  • नवजात को भी कई बार “अशुभ” मान लिया जाता है

यह सोच जनजाति के दार्शनिक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें जन्म दुख और मृत्यु स्वतंत्रता से जोड़ी जाती है।

24 परिवारों वाला छोटा समुदाय, मगर मान्यताएं बेहद गहरी

सातिया जनजाति लगभग 24 परिवारों का छोटा समुदाय है, लेकिन इनकी मान्यताएं गहरी और असाधारण हैं।
कई रिपोर्टें बताती हैं कि यहाँ शिक्षा का स्तर कम है और शराब की लत आम है, लेकिन फिर भी इनकी संस्कृति यह सवाल उठाती है कि—

क्या जीवन और मृत्यु के बारे में हमारी समझ सचमुच उतनी सरल है जितनी हम मानते हैं?

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