Near Death Experience: मौत… एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब इंसान सदियों से खोज रहा है। क्या मौत के बाद भी जीवन है? क्या आत्मा अमर होती है? इन सवालों के जवाब अक्सर उन लोगों की कहानियों में मिलते हैं, जिन्होंने नियर डेथ एक्सपीरियंस (NDE) यानी मौत को बेहद करीब से महसूस किया हो। अमेरिका के मैरीलैंड की रहने वाली 80 वर्षीय पादरी नॉर्मा एडवर्ड्स (Norma Edwards) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नॉर्मा सिर्फ एक नहीं, बल्कि तीन बार क्लीनिकली डेड घोषित की जा चुकी हैं और हर बार वापस लौटीं। इस दौरान उन्होंने जो देखा, उसका दावा बेहद चौंकाने वाला है।

पहली बार मौत से सामना: शरीर से बाहर निकलने का अनुभव

नॉर्मा एडवर्ड्स की जिंदगी में पहली बार मौत तब आई, जब वह महज 20 साल की थीं। काम पर जाते वक्त वह अचानक गिर पड़ीं और दिल की धड़कन रुक गई। डॉक्टरों के मुताबिक, उनके शरीर में मौजूद एक मृत भ्रूण खून में ज़हर फैला रहा था।

नॉर्मा बताती हैं,

“मैंने खुद को ऑपरेशन टेबल पर लेटे देखा, जैसे मेरी आत्मा शरीर से बाहर निकल गई हो। दर्द पूरी तरह खत्म हो चुका था।”

इसके बाद उन्होंने एक अंधेरी सुरंग से तेज रफ्तार में गुजरने और अंत में एक बेहद तेज, सफेद रोशनी में समाने का अनुभव किया।

जिंदगी का ‘लाइफ रिव्यू’: तीन कॉलम वाली स्क्रीन

नॉर्मा का दावा है कि उस रोशनी में उन्होंने एक विशाल स्क्रीन देखी, जहां उनकी पूरी जिंदगी दिखाई जा रही थी।
स्क्रीन पर तीन कॉलम थे—

  • पहला: धरती पर आने से पहले उनके लिए तय की गई जिंदगी

  • दूसरा: असल जिंदगी में उन्होंने क्या किया

  • तीसरा: उसका परिणाम

हर बार स्क्रीन पर एक ही संदेश उभरता—
“मकसद पूरा नहीं हुआ।”

मृत चाची से मुलाकात और जीवन का संदेश

इस अनुभव के दौरान नॉर्मा की मुलाकात उनकी दिवंगत चाची से हुई। उन्होंने नॉर्मा को छूने से मना किया और एक संदेश दिया—

“जीवन शाश्वत है, मौत अंत नहीं है।”

इसके बाद नॉर्मा को दोबारा शरीर में लौटना पड़ा, जिसे उन्होंने बेहद दर्दनाक बताया।

शरीर में वापसी का दर्द और बदली हुई शक्तियां

नॉर्मा कहती हैं कि आत्मा का शरीर में लौटना ऐसा था, जैसे
“एक पूरी आकाशगंगा को चाय के प्याले में भर दिया जाए।”

वापसी के बाद उनकी इंद्रियां असामान्य रूप से तेज हो गईं। उनका दावा है कि वे लोगों के शरीर के अंदर तक देख सकती थीं और उनके पास आते ही बिजली के बल्ब फूट जाते थे।

नवंबर 2024: दो बार फिर मौत के करीब

नवंबर 2024 में नॉर्मा को दो बार कार्डियक अरेस्ट आया। एम्बुलेंस में ले जाते वक्त वह फिर से क्लीनिकली डेड हो गईं। इस बार उन्होंने एक महिला फरिश्ते को देखा, जिसने उन्हें बताया कि उनका मिशन अभी अधूरा है।

उन्हें कहा गया—

“तुम्हें लोगों को मौत के डर से मुक्त करने के लिए वापस जाना होगा।”

आज का मिशन: मौत से डरने वालों को देना हौसला

आज नॉर्मा एडवर्ड्स बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार लोगों के साथ काम करती हैं। वह उन्हें समझाती हैं कि मौत से डरने की जरूरत नहीं है।

नॉर्मा कहती हैं,

“मौत अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। जब तक सांस है, वही सबसे बड़ा उपहार है।”

क्या कहती है यह कहानी?

नॉर्मा एडवर्ड्स का अनुभव विज्ञान और आस्था के बीच की उस सीमा को छूता है, जहां सवाल खत्म नहीं होते, लेकिन सोचने की दिशा जरूर बदल जाती है।

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