19वीं सदी की शुरुआत में जब दुनिया के बड़े शहरों में आबादी का बोझ बढ़ा, तो वहां रहने वालों के लिए जमीन कम पड़ने लगी और मरने वालों के लिए कब्रिस्तान छोटे पड़ गए. इसी समस्या ने ब्रिटेन की राजधानी में एक ऐसी अजीब व्यवस्था को जन्म दिया, जिसे दुनिया आज ‘लंदन नेक्रोपोलिस रेलवे या मौत वाली रेलगाड़ी (Death Railway)’ के नाम से जानती है. इसकी सच्चाई रोंगटे खड़े कर देने वाली है. लंदन के इतिहास का यह वह काला अध्याय है, जब शहर की सड़कों पर लाशों का अंबार लगा था और चर्च के कब्रिस्तानों में जरा सी भी जगह नहीं थी.
हालात इतने खराब हो गए कि नई लाशों को दफनाने के लिए पुरानी कब्रों को खोदकर कंकाल बाहर फेंके जाने लगे. बाद में प्रशासन ने लंदन से 23 मील दूर सरे के ब्रुकवुड में एक बड़ा कब्रिस्तान बनाया, जहां लोगों को दफनाने की व्यवस्था थी. लेकिन उस दौर की घोड़ा-गाड़ियों से शव को इतनी दूर ले जाना नामुमकिन था.
इस संकट को दूर करने के लिए साल 1854 में एक ऐसी रेलवे लाइन बिछाई गई, जो केवल शवों और शोक में डूबे परिजनों को शहर से दूर इस कब्रिस्तान तक ले जाती थी. प्रशासन ने वाटरलू स्टेशन के पास इस खास रेलवे स्टेशन को बनाया, जहां से हर वर्ग के लोगों के शवों को ब्रुकवुड ले जाया जाता था. लेकिन इस रेल यात्रा के नियम बेहद चौंकाने वाले थे. इसमें ताबूतों के लिए भी एक तरफ का टिकट जारी किया जाता था, क्योंकि उन्हें वापस नहीं आना था.
हालांकि, साथ जाने वाले रिश्तेदारों को वापसी का टिकट दिया जाता था, ताकि वे अंतिम संस्कार के बाद इसी ट्रेन से शहर लौट सकें. ट्रेन ब्रुकवुड पहुंचने पर दो अलग-अलग स्टेशनों पर रुकती थी. एक स्टेशन एंग्लिकन संप्रदाय के लोगों के लिए था और दूसरा अन्य धर्मों के मानने वालों के लिए. दिलचस्प बात यह है कि इस ‘मौत की रेल’ में भी अमीरी और गरीबी का भेदभाव साफ दिखाई देता था.
प्रथम श्रेणी के अंतिम संस्कार में लोगों को अपनी पसंद की जगह और शानदार स्मारक बनाने की पूरी छूट थी. दूसरी श्रेणी में स्मारक के लिए एक्स्ट्रा पैसे देने पड़ते थे, वरना कब्र को बाद में किसी और के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था. सबसे ज्यादा भीड़ तीसरी श्रेणी में होती थी, जहां गरीबों का अंतिम संस्कार स्थानीय संस्थाओं के खर्च पर होता था. करीब 80 प्रतिशत सफर इसी श्रेणी में होते थे.
अमीर यात्रियों के लिए स्टेशन पर अलग कमरे थे और ताबूत चढ़ाते समय मृतक का नाम सम्मान से पुकारा जाता था, जबकि गरीबों के लिए ऐसी कोई औपचारिकता नहीं थी. जैसे-जैसे शहर और बढ़ता गया, लंदन के पुराने कब्रिस्तानों को हटाकर वहां नई इमारतें और सड़कें बनाने की जरूरत पड़ी. तब इसी नेक्रोपोलिस रेलवे ने एक विशाल अभियान चलाकर 21 अलग-अलग चर्चों से हजारों शवों को निकाला और उन्हें ब्रुकवुड के नए कब्रिस्तान में पहुंचाया.
यह ट्रेन हर दिन चलती थी, लेकिन रविवार को सबसे ज्यादा व्यस्त रहती थी. इसकी वजह यह थी कि मजदूरों को केवल रविवार को ही छुट्टी मिलती थी और वे नहीं चाहते थे कि अंतिम संस्कार के चक्कर में उनकी एक दिन की कमाई मारी जाए. यह सिलसिला 1941 तक चलता रहा. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भीषण बमबारी ने लंदन के इस स्टेशन और पटरियों को पूरी तरह तबाह कर दिया.
लेकिन उस वक्त तक शव ले जाने के लिए मोटर गाड़ियां इस्तेमाल होने लगी थीं, इसलिए युद्ध के बाद इसे फिर से बहाल करना जरूरी नहीं समझा गया. आज भी लंदन के वेस्टमिंस्टर ब्रिज हाउस की बाहरी दीवार पर उस पुराने स्टेशन के निशान देखे जा सकते हैं. बता दें कि विक्टोरियन युग के लोग मौत को लेकर काफी भावुक और अजीब हुआ करते थे. उस दौर में मुर्दों की तस्वीरें खींचना और ‘मेमेंटो मोरी’ जैसी चीजों को पास रखना आम था, लेकिन लाशों के लिए पूरी की पूरी ट्रेन चलाना इतिहास का सबसे डरावना प्रयोग था.