Unknown Fact : ईरान में चल रहे तनाव और पूरे मिडिल ईस्ट में बढ़ते संकट का असर अब दुनिया पर साफ दिखने लगा है. कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ा है.
इसके चलते कई एशियाई देशों में गैस संकट गहराता जा रहा है. भारत में भी एलपीजी (रसोई गैस) को लेकर परेशानी बढ़ गई है, कहीं सिलेंडर बुक नहीं हो पा रहे हैं तो कहीं समय पर डिलीवरी नहीं मिल रही.
इसी बीच राहत की खबर सामने आई है कि एलपीजी से भरे दो जहाज ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ हाल ही में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार कर भारत पहुंच चुके हैं.
इन जहाजों में करीब 92,700 टन गैस लदी हुई थी, जो देश की एक से दो दिन की जरूरत पूरी कर सकती है. अब लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर इन जहाजों से आई गैस हमारे घरों तक कैसे पहुंचती है? आइए इस पूरी प्रक्रिया को समझते हैं.
एलपीजी मुख्य रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की रिफाइनिंग के दौरान उप-उत्पाद के रूप में तैयार होती है. यह प्रोपेन और ब्यूटेन गैसों का मिश्रण होती है, जिसे उच्च दबाव में तरल रूप में बदलकर सिलेंडरों में भरा जाता है.
शिपिंग के दौरान इसे बेहद कम तापमान पर लिक्विड अवस्था में रखा जाता है और बड़े विशेष जहाजों (लार्ज गैस कैरियर्स) में लोड किया जाता है. इसके बाद ये जहाज समुद्री रास्ते से गैस को भारत के तटीय टर्मिनलों जैसे दाहेज (गुजरात), मंगलुरु (कर्नाटक) और विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) तक पहुंचाते हैं.
बंदरगाह पर पहुंचने के बाद एलपीजी, जो लगभग -42 डिग्री सेल्सियस तापमान पर तरल रूप में होती है, उसे जहाज से उतारकर बड़े कोल्ड स्टोरेज टैंकों में सुरक्षित रखा जाता है. इसके बाद इन टैंकों से गैस को पाइपलाइन के जरिए देशभर के बॉटलिंग प्लांट्स तक भेजा जाता है.
वहां पहुंचने पर खाली सिलेंडरों की जांच की जाती है और फिर उनमें तय मात्रा, जैसे 14.2 किलोग्राम एलपीजी भरी जाती है. चूंकि एलपीजी में खुद कोई गंध नहीं होती, इसलिए उसमें मर्कैप्टन नाम का पदार्थ मिलाया जाता है, ताकि गैस लीक होने पर तुरंत पहचान हो सके.
इसके बाद भरे हुए सिलेंडरों को ट्रकों के माध्यम से स्थानीय गोदामों तक पहुंचाया जाता है. पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद, जब आप गैस सिलेंडर बुक करते हैं, तो गैस एजेंसी का डिलीवरी कर्मी उसे आपके घर तक पहुंचा देता है.