बिलासपुर | छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट में एक अनोखा पारिवारिक मामला सामने आया है। आमतौर पर फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक देने से इनकार करने पर पक्षकार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं, लेकिन इस मामले में पति-पत्नी ने आपसी सहमति से मिले तलाक को ही रद्द करने की मांग की।
फैमिली कोर्ट से मिला था आपसी सहमति से तलाक
मामला सिविल लाइन क्षेत्र की एक महिला और मोपका निवासी युवक से जुड़ा है। शादी के कुछ समय बाद रिश्तों में खटास आ गई और दोनों ने अलग रहने का निर्णय लिया।
इसके बाद उन्होंने परिवार न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दी। फैमिली कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी।
रिश्तों में आई नरमी, फिर साथ रहने का फैसला
तलाक के कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में सुधार हुआ। आपसी समझदारी बढ़ी और दंपती ने दोबारा साथ रहने का निर्णय लिया।
याचिका में बताया गया कि:
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शादी की सालगिरह साथ मनाई
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साथ घूमने-फिरने गए
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होटल बुकिंग और ट्रेन यात्रा के प्रमाण पेश किए
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11 से 15 मार्च 2025 के बीच मथुरा यात्रा की तस्वीरें भी सौंपी
इन तथ्यों के आधार पर पत्नी ने हाईकोर्ट में तलाक की डिक्री रद्द करने की मांग की।
डिवीजन बेंच का स्पष्ट रुख
मामले की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच में हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि:
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तलाक आपसी सहमति से हुआ है।
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कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता।
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कानून भावनाओं से नहीं, तथ्यों और निर्धारित प्रक्रिया से चलता है।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
कानूनी प्रक्रिया बनाम भावनात्मक निर्णय
यह मामला बताता है कि व्यक्तिगत रिश्तों में बदलाव संभव है, लेकिन न्यायालय का निर्णय विधिक प्रावधानों के अनुसार होता है। एक बार आपसी सहमति से तलाक की डिक्री पारित हो जाने के बाद उसे केवल भावनात्मक आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।